क्या आप जानते हैं उत्तराखंड के छोटे चारधाम | Uttarakhand Ke Chhote Chardham Yatra

उत्तराखंड के छोटे चार धाम की यात्रा (Uttarakhand Ke Chhote Chardham)

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नमस्कार दोस्तो आज हम आपको लेकर चलते हैं छोटे चारधाम यात्रा पर। इस लेख में हम आपको उत्तराखंड के चारधाम यात्रा (जिन्हें छोटे चारधाम भी कहा जाता है) की शुरुआत से लेकर समापन तक के रास्तों,बीच में पड़ने वाले नगरों,शहरों से होते हुए इस यात्रा से जुड़ी हर छोटी से छोटी से अवगत करवाने का प्रयास करेंगे ताकि आप घर बैठे इन धाम की यात्रा व भक्ति भाव मिश्रित रोमांच को महसूस कर सकें और यदि आप इस यात्रा पर जाने का विचार कर रहे हैं तो उम्मीद है सारी उपयोगी जानकारी इस लेख छोटे चारधाम Uttarakhand Ke Chhote Chardham Yatra में आपको पहले से ही मिल जाएगी।

भारत धर्मप्रधान देश है इसके प्राणों में धर्म का वास है,भारतीय जनता की व्रत,तीर्थ और उपवास में परम आस्था है।
भारतवर्ष में बद्रिकाश्रम(बद्रीनाथ) ,रामेश्वरम , द्वारिका और जगन्नाथ पुरी चार धाम हैं जो हर तीर्थ और धाम में सर्वोच्च स्थान रखते हैं।

इसी तरह उत्तराखंड की पुण्य भूमि हिमालय की पावन,पवित्र और प्राकृतिक गोद में बद्रीनाथ,केदारनाथ,गंगोत्री व यमुनोत्री के नाम से प्रसिद्ध चार धाम स्थित है।
आज हम उत्तराखंड के इन चार पावन धामों(छोटे चारधाम) के बारे में जानेंगे। आशा करते हैं लेख आपको पसंद आएगा।

भारत की चारों दिशाओं उत्तर में बद्रीनाथ दक्षिण में रामेश्वरम पूर्व में जगन्नाथ पुरी और पश्चिम में द्वारिका धाम है ये भारत के के चारधाम कहलाते हैं।

उत्तराखंड के छोटे चारधाम

उत्तर में बर्फ से ढका हिमालय है जिसका एक भाग आज उत्तराखंड (गढ़वाल) के नाम से जाना जाता है पूर्व में उत्तराखंड को केदारखंड,पांचाल देश,उत्तरापथ के नाम से भी पुकारा जाता था।

प्राचीन ग्रंथों में गढ़वाल के दो भाग बताए जाते हैं जिस हिस्से का जल हरिद्वार के ऊपर गंगा में मिल जाता है उस भाग को केदारखण्ड व दूसरा भाग मानसखंड कहा जाता है इस भाग को पर्वतीय द्वीप भी कहते हैं। गंगा नदी इसी मानसखंड से निकलती है।

ऋषि,मुनियों के यहां आदिकाल से निरंतर तपस्या में लीन रहने के कारण इस भूमि को तपोभूमि भी कहते हैं,इस शांत तपोभूमि में बद्रीनाथ,केदारनाथ,यमुनोत्री और गंगोत्री के सुंदर मंदिर स्थित हैं।

सातवीं शताब्दी में आदिशंकराचार्य जी उत्तराखंड पधारे थे और बद्रीनाथ के मंदिर में पूजा अर्चना की थी उसके बाद से बद्रीनाथ की गिनती चारधाम में होने लगी।

पुराने समय में इन धामों छोटे चार धाम Uttarakhand ke Chhote Chardham की यात्रा करना बहुत ही कठिन हुआ करता था।श्रद्धालु गण समूह बनाकर महीनों चलकर यहां तक पहुंचते थे। लोग पैदल ही चलते थे और सा मान घोड़ों,खच्चरों पर लादकर ले जाते थे।

उस समय इन जगहों पर रहने,खाने पीने की कोई व्यवस्था नहीं होती ना ही सुगम मार्ग और सड़कें थी।बर्फीली आंधियों और कड़ी ठंड की वजह से बहुत से यात्रियों की मौत होती रहती थी।

वर्तमान में सुगम यातायात,अच्छी सड़कें, वाहनों बस,टेक्सी आदि, होटल, धर्मशालाओं की समुचित सुविधा हो चुकी है जिससे आमजन के लिए इन धाम पर आना आसान हो गया है फिर भी बरसात के मौसम में यहां आने से बचना चाहिए इन दिनों में land slide होते रहते हैं और सड़क मार्ग बाधित होता है पत्थर व पेड़ों के गिरने से जान माल के नुकसान होने की आशंका बढ़ जाती है।

छोटे चारधाम यात्रा की शुरुआत (Chhote chardaham yatra starting point)

मां गंगा की जय,बाबा केदार की जय के साथ ऋषिकेश से यात्रा की शुरुआत होती है जो एक तीर्थ ही है यहां से Taxi, कार,बस,मिनी बस इत्यादि चलती हैं । अधिकतर यात्री बसों द्वारा ही पहुंचते हैं।

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सबसे पहले यमुनोत्री धाम जाया जाता है उसके बाद गंगोत्री और केदारनाथ होकर आखिर में यात्री बद्रीनाथ जाते हैं इसे पूरा चार धाम यात्रा माना जाता है।

यमुनोत्री धाम की यात्रा का मार्ग (Rout of Yamunotri Dham)

ऋषिकेश ऋषिकेश से रवाना होने के बाद मुनि की रेती के पास दो मार्ग मिलते हैं एक मार्ग यमुनोत्री और गंगोत्री को जाता है दूसरे मार्ग से केदारनाथ और बद्रीनाथ की तरफ जाया जाता है।

जिन यात्रियों को चार धाम की यात्रा करनी है वह पहले यमुनोत्री जाते हैं घुमावदार पहाड़ी रास्तों पर बसें धीमी गति से प्राकृतिक हरियाली के बीच से गुजरती हुई नरेंद्र नगर पहुंचती है इसके बाद चंपा नामक स्थान है ।
चंपा से बर्फ के पहाड़ दिखाई देना शुरू हो जाते हैं चंपा से चलने के बाद टिहरी(tihari) में रात्रि विश्राम भोजन की अच्छी व्यवस्था मिल जाती है।
यमुनोत्री मार्ग का अंतिम पड़ाव हनुमान चट्टी(hanuman chatti) है यहां से यमुनोत्री की दूरी 13 किलोमीटर है और यह 13 किलोमीटर यात्रियों को पैदल चलना होता है।

ऋषिकेश से यमुनोत्री (Rishikesh To Yamunotri)

ऋषिकेश से यमुनोत्री की अनुमानित दूरी 225 किलोमीटर है बीच में आप चंपा या टिहरी में कहीं भी रात्रि विश्राम कर सकते हैं। हनुमान चट्टी से यमुनोत्री जाने वाला रास्ता काफी कठिन है जो पैदल चलने में असमर्थ हैं उनके लिए यहां घोड़े डोली आदि की व्यवस्था उचित दाम पर मिल जाती है। स्वस्थ आदमी के लिए पैदल चलना भी शानदार न भूलने वाला अनुभव होता है ।

यात्री हाथ में डंडा लेकर चलता रहता है इस मार्ग पर चारों तरफ आडू व चीड़ के पेड़ साथ चलते हैं नदी भी मार्ग के साथ साथ चलती है । आगे चलने पर जानकी चट्टी में खाने-पीने और चाय की दुकानें हैं रुकने के लिए कमरे आदि भी मिल जाते हैं ।
जानकीचट्टी से पहाड़ आपको बिल्कुल नजदीक आते प्रतीत होते हैं यहां गर्म कपड़े इत्यादि साथ ले जाना ठीक है क्योंकि जानकीचट्टी पर कड़ाके की सर्दी पड़नी शुरू हो जाती है। जानकी चट्टी की समुद्र तल से ऊंचाई 3323 मीटर है। छोटे चारधाम Uttarakhand ke Chhote Chardham Yatra

यमुनोत्री के चमत्कार (miracle in Yamunotri)

यमुनोत्री पहुंचने पर आपको प्रकृति के कुछ अद्भुत चमत्कार देखने को मिलते हैं जहां एक तरफ यमुना की शीतल जलधारा है तो दूसरी तरफ गर्म जल का कुंड है Warm Water गर्म जल कुंड में तीर्थयात्री नहाते हैं उसके बाद मंदिर में प्रवेश करते हैं यात्रीगण गर्म जल कुंड में आलू चावल कपड़े की पोटली में बांधकर पकाते भी हैं। यमुनोत्री मंदिर अक्षय तृतीया से लेकर दीपावली तक खुला रहता है।

यमुनोत्री की कहानी ( Story behind Yamunotri Dham )

यमुनोत्री धाम के से जुड़ी एक पौराणिक कथा सुनाई जाती है कहते हैं यहां अग्निदेव ने कठोर तपस्या करके देव पाल का पद प्राप्त किया था । तप्त कुंड उसी तपस्या स्थल पर स्थित है। तप्त कुंड को गोरखा डिबिया(Gorakh Dibiya) भी कहा जाता है, यमुना नदी कालिंद पर्वत के बर्फीले खंडों से निकलती है इसलिए यमुना को कालिंदी भी कहा जाता है।

ऐसी मान्यता है कि यमुनोत्री धाम में स्नान करने से समस्त पापों का नाश होता है सदियां बीत जाने के बाद भी आम जनमानस के मन में यमुना जी के पावन स्वरूप की पवित्रता बसी हुई है। Uttarakhand ke Chhote Chardham यात्रा जारी है|

गंगोत्री धाम का मार्ग ( Rout Of Gangotri Dham)

गंगोत्री धाम जाने के लिए यात्री को हनुमान चट्टी तक लौट कर आना पड़ता है । हनुमान चट्टी से गंगोत्री धाम की दूरी 215 किमी है । धरासू से गंगोत्री धाम जाने के लिए रास्ता निकलता है यहां से अधिकतर बसें उत्तरकाशी पहुंच कर रूकती है ।

उत्तरकाशी(Uttarkashi) काफी बड़ा और सुंदर शहर है हरे-भरे मैदान दुकान और मकान दिखलाई पड़ते हैं उत्तरकाशी में भी बहुत से ऐतिहासिक मंदिर है बहुत से धर्मशाला एवं छोटे बड़े होटल रेस्टोरेंट हैं गंगोत्री जाने के रास्ते में उत्तरकाशी सबसे बड़ा शहर है।

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उत्तरकाशी से चलने के लगभग 4 घंटे यात्री गंगनानी के तप्त कुंड पहुंचते हैं यह तत्व कुंड स्वच्छ और सुंदर नानी से लेकर लंका चट्टी तक के मार्ग में देवदार के घने पेड़ भरपूर मात्रा में है। यहां से बसें सीधे गंगा मैया के मंदिर के सामने तक जाती हैं ।

भैरों घाटी पर आपको खड़ी चढ़ाई मिलती है जहां पहाड़ों से दूध जैसे सफेद झरने तेजी से गिरते हैं पहाड़ बर्फ से ढके हैं और इस बर्फ के नीचे से पानी बहता रहता है। गंगोत्री के पूरे मार्ग में आपको अद्भुत सुंदर झरनों के दृश्य बहुतायत में मिलते हैं ।

समुद्र तल से गंगोत्री की ऊंचाई 3122 मीटर है । गंगोत्री मंदिर के साथ में लगा हुआ छोटा सा बाजार है जहां खाने पीने चाय नमकीन जैसा सामान मिलता है।

गंगोत्री मंदिर (Gangotri Dham Mandir)

गंगोत्री धाम मंदिर में माता लक्ष्मी,मां सरस्वती,मां पार्वती और गंगा यमुना की अति सुंदर अलौकिक प्राचीन मूर्तियां स्थापित हैं और उन देवियों के सामने राजा भागीरथ हाथ जोड़े खड़े हैं।

राजा भागीरथ को ही गंगा नदी के पृथ्वी पर अवतरण के श्रेय मिलता है इसी कारण गंगा जी का एक नाम भागीरथी भी है।
गंगोत्री धाम पौराणिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है गंगा जी का उद्गम स्थल गोमुख यहां से 24 किलोमीटर दूर है स्वस्थ और निडर यात्री गोमुख की यात्रा करते हैं क्योंकि गोमुख जाने का मार्ग बर्फ से ढका हुआ और अत्यंत कठिन है उत्साही युवा इस रोमांच से वंचित रहना नहीं चाहते।

गंगोत्री की कथा (Story behind Gangotri Dham)

इक्ष्वाकु वंश मैं एक प्रतापी राजा हुए थे जिनका नाम था सगर , राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया और जब यज्ञ का घोड़ा छोड़ा तो देवराज इंद्र उनके प्रताप से घबरा गए ।
देवराज इंद्र ने अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को चुरा कर कपिल मुनि के आश्रम में छुपा दिया । जब घोड़े को ढूंढने राजा सगर और उनके 1000 पुत्र निकले और उन्होंने घोड़े को कपिल मुनि के आश्रम में बंधा हुआ देखा तो गुस्से में आकर उन्होंने कपिल मुनि को अपशब्द कह दिए।
अपशब्दों से क्रोधित होकर मुनि ने उन सभी को अपने तपोबल से भस्म कर दिया।

Uttarakhand ke Chhote Chardham Yatra
Uttarakhand ke Chhote Chardham Yatra

आगे चलकर इक्ष्वाकु वंश में भागीरथ ने जन्म लिया यह सब उन्हें ज्ञात हुआ कि किस प्रकार उनके पितरों की अभी तक गति नहीं हुई है तो अपने पितरों की गति के लिए राजा भागीरथ कैलाश पर्वत पर तपस्या करने लगे।
तब एक दिन मां गंगा उनकी तपस्या से प्रसन्न हुई और राजा भागीरथ से वर मांगने के लिए कहा। भागीरथ ने मां गंगा से अपने पूर्वजों की गति करने का निवेदन किया और इस प्रकार माता गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुई और मां गंगा के आशीर्वाद से राजा भागीरथ के पितरों का तारण हुआ।

मां गंगा मैदानों को हरा-भरा करते हुए कपिल मुनि के आश्रम से गुजरती हुई समुंदर में जा मिलती है यह मां गंगा से जुड़ी हुई पौराणिक कथा है जो गंगोत्री को पवित्र धाम बनाती है।

केदारनाथ धाम का मार्ग (Route Of Kedarnath Dham)

गंगोत्री धाम से केदारनाथ धाम की दूरी 343 किलोमीटर है। केदारनाथ जाने के लिए गंगोत्री से टिहरी तक लौट कर आना पड़ता है, फिर टिहरी से श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, तिलकड़ा और उसके बाद गौरीकुंड पहुंचते हैं ।

टैक्सियां और बसें गौरीकुंड तक ही आती है गौरीकुंड से आगे लगभग 14 किलोमीटर का पैदल मार्ग है । यहां भी यमुनोत्री धाम के जैसे ही घोड़े , खच्चर , डोली, पालकी की व्यवस्था मिल जाती है। गौरीकुंड में भी रहने और खाने की अच्छी व्यवस्थाएं हैं। यमुनोत्री धाम की तरह यहां भी एक तप्त कुंड है इस तप्त कुंड में स्नानादि करके यात्री केदारनाथ की ओर बढ़ते हैं यह संकरा मार्ग है जिसके एक ओर ऊंचे पहाड़ हैं दूसरी तरफ गहरी खाई है ।

इस मार्ग पर चलते यात्रियों को पर्वत देत्याकार लगते हैं बर्फ के पहाड़ हाथ भर की दूरी पर महसूस होते हैं समुद्र तल से केदारनाथ की ऊंचाई लगभग 3583 मित्र हैं ।
केदारनाथ धाम में एक रात्रि रुकना अधिकतर श्रद्धालु अच्छा मानते हैं क्योंकि यहां की प्राकृतिक सुंदरता अद्भुत है सुबह प्रातः काल जब केदार बाबा की आरती मंदिर से गूंजती है तो सच में अलौकिक अनुभव होता है भक्तगण भाव विभोर हो उठते हैं । केदारनाथ प्रातः कालीन सूर्योदय का दृश्य देखने लोग विदेशों से भी आते हैं ।

जब यात्री केदारनाथ पहुंचते हैं तो खुशी के कारण आंसू बहने लगते हैं भावविभोर हो रोने लगते हैं ।केदार की ऊंचाई खत्म होने के बाद ऊपर समतल मैदान हैं और इस मैदान के चारों तरफ बर्फ से आच्छादित पहाड़ी है,भक्तगण पुल पार करने के बाद बाबा केदार के मंदिर पहुंचते हैं।  आप पढ़ रहे हैं चार धाम की यात्रा Uttarakhand Ke Chhote Chardham

केदारनाथ धाम की कथा (Story behind Kedarnath Dham)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का निर्माण पांडवों ने करवाया था। महाभारत युद्ध के बाद अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए पांडव यहां आ कर तपस्या करने लगे तब भगवान शिव ने भैंसे का रूप धारण किया और यहां से चले गए जिसके बाद पांडवों ने भगवान शिव से विनती की उसके बाद शिव उसी रूप में यहां स्थापित हुए ।

भैंसे का जो रूप शिव ने बनाया था उसका पिछला धड़ यहां प्रकट हुआ भगवान शिव का यही रूप मंदिर में विराजमान है मंदिर में प्रवेश करते ही नंदी महाराज की एक बड़ी सी मूर्ति है और मंदिर में बैल की आकृति का एक पत्थर है और इसे भगवान का बैल माना जाता है यह बेल के पिछले भाग की आकृति है।

Uttarakhand ke Chhote Chardham Yatra
Uttarakhand ke Chhote Chardham Yatra

बैल के आगे का भाग काठमांडू (नेपाल) में बताया जाता है । केदारनाथ का स्वरूप भारत के बाहर ज्योतिर्लिंगों में से एक है केदार मंदिर के बाहरी भाग में माता पार्वती पांडव, लाभी की सुंदर मूर्तियां स्थापित है बाबा केदार की पूजा करने के बाद भक्तगण भिंडी को आलिंगन करते हैं।

मंदिर के आगे पत्थर का जगत मोहन (Jagmohan) बना है इस जगमोहन की चारों तरफ पांचो पांडव और द्रोपदी की मूर्तियां बनी हुई है और बीच में पीतल के नंदी महाराज विराजमान हैं यहां छोटे-बड़े कई आकार की घंटे लगे हुए हैं द्वार के दोनों तरफ दो द्वारपाल हैं इसके अलावा भी कई और मूर्तियां हैं । केदारनाथ की मूर्तियां पंचमुखी स्वरूप में है।

 

केदारनाथ के दर्शनीय स्थल (visiting Site’s in Kedarnath)

केदारनाथ धाम में मुख्य मंदिर के अलावा क्रौंच तीर्थ (जहां मधु गंगा और मंदाकिनी का संगम होता है) रीता कुंड, ब्रह्म तीर्थ, इंद्र पर्वत, मंदाकिनी घाटी, वासु की ताल, भीम गुफा, मधु गंगा, भैरो शिला, हंस कुंड आदि अत्यंत सुंदर और नयनाभिराम दर्शनीय स्थल है।

मंदाकिनी नदी (Mandakini Rivar)

यहां एक पुराना तालाब भी है जिसमें महात्मा गांधी की अस्थियों का विसर्जन किया गया था इसके बाद से यह तालाब गांधी सरोवर के नाम से जाना जाता है इस तालाब से मंदाकिनी नदी निकलती है।

बद्रीनाथ धाम ( Badrinath Dham )

बद्रीनाथ जाने के लिए वापस लौट कर गौरीकुंड आना होता है गौरीकुंड से दो रास्ते हैं एक अखी मठ की तरफ जाता है दूसरा रास्ता रुद्रप्रयाग की तरफ जाता है।

बद्रीनाथ जाने के मार्ग में गोपेश्वर, चमोली, पीपलकोटी व जोशीमठ जैसे नगर पड़ते हैं। इन नगरों में यात्रियों की आवश्यकता की सभी वस्तुएं बाजारों में उपलब्ध हो जाती है । जोशीमठ तक की सड़क काफी अच्छी है इससे आगे मार्ग काफी संकरा और तीखी चढ़ाई वाला शुरू हो जाता है यहां से दोपहिया वाहनों का वन वे रास्ता है ।आप पढ़ रहे हैं  Uttarakhand ke Chhote Chardham Yatra

वाहनों के आने-जाने का समय प्रशासन द्वारा निश्चित किया हुआ है जोशीमठ से चलने के बाद विष्णुप्रयाग,गोविंदघाट आते हैं इसके बाद बद्रीनाथ धाम आता है। ऋषिकेश से बद्रीनाथ धाम मार्ग में पांच प्रयाग आते हैं ये प्रयाग हैं देवप्रयाग रुद्रप्रयाग कर्णप्रयाग नंदप्रयाग और श्री विष्णु प्रयाग

बद्रीनाथ धाम की समुद्र तल से ऊंचाई 3122 बैठा है बद्रीनाथ धाम अलकनंदा नदी की घाटी और नारायण पर्वत के बीच में बसा है । दो पहिया वाहन मंदिर के बिल्कुल पास तक पहुंच सकते हैं बद्रीनाथ धाम के एक तरफ नर पर्वत तो दूसरी और नारायण पर्वत स्थित है ।

नीलकंठ महादेव (Neelkanth Mahadev)

बद्रीनाथ से कुछ ही दूर पर नीलकंठ महादेव की ऊंची चोटी स्थित है । इस स्थान पर पहले बेर का जंगल था बेर को स्थानीय भाषा में बद्री कहा जाता है इस प्रकार यह वन (बद्री वन Badrivan) के नाम से और धाम बद्रीनाथ धाम के नाम पुकारा जाता था।

बद्रीनाथ की कथा (Story behind Badrinath Dham)

पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु ने यहां पर तपस्या की थी भगवान विष्णु की तपस्या के दौरान माता लक्ष्मी ने बेर का स्वरूप धारण कर उनको अपने आगोश में रखा था या यूं समझें उन्हें बेर के रूप में ढक लिया था जिससे भगवान विष्णु बर्फ, सर्दी, गर्मी, बरसात से बचे रहे तपस्या पूर्ण कर भगवान ने जब आंखें खोली तो वह माता लक्ष्मी से बहुत प्रसन्न हुए ।

उन्होंने माता लक्ष्मी से कहा मांगो तुम क्या चाहती हो तो माता लक्ष्मी ने उत्तर दिया हे नाथ मुझे कुछ नहीं मांगना मेरी तो बस एक ही इच्छा है कि मेरा नाम आपके नाम से पहले आ जाए

भगवान विष्णु ने कहा तथास्तु और इस प्रकार नाथ से पहले बद्री शब्द जोड़ने पर बद्रीनाथ हुआ इसका अर्थ है बद्री का नाथ अर्थात माता लक्ष्मी के नाथ भगवान विष्णु बद्रीनाथ

बद्रीनाथ धाम मंदिर (Temple Of Badrinath)

बद्रीनाथ बद्री धाम का मंदिर देखने में अत्यंत सुंदर और नयनाभिराम है । मंदिर की ऊंचाई 50 फीट हैं अलकनंदा नदी मंदिर के पास से निकलती है बद्रीनाथ मंदिर में भी जाने के लिए केदारनाथ मंदिर की तरह एक पुल पर करना पड़ता है इस पुल पर पंडे पुजारियों की भीड़ जुटी रहती है।

बद्रीनाथ मंदिर के सामने गर्म जल का तप्त कुंड है श्रद्धालु तप्त कुंड में स्नान करने के बाद और कुंड की पूजा करने के बाद ही मंदिर में प्रवेश करते हैं ।सीढ़ियां चढ़ने के बाद जब श्रद्धालु मंदिर में पहुंचता है तो उसे अनेकों मूर्तियों के साक्षात दर्शन होते हैं मंदिर में मुख्य मूर्ति भगवान विष्णु की है ।

भगवान विष्णु की कलात्मक मूर्ति शालिग्राम से बनी हुई है भगवान विष्णु की मूर्ति के दाहिनी तरफ कंवर की मूर्ति है और सामने की तरफ उत्सव व उद्धव जी की प्रतिमाएं हैं । यहां श्रीदेवी और भू देवी की मूर्तियां भी विराजमान है कहते हैं सातवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य जी को यह मूर्ति जलकुंड में मिली थी ।

जिसे एक बार गरुड़ कोठी में स्थापित किया गया जिसे कुछ लोगों ने उखाड़कर तालाब में छुपा दिया। कई शताब्दियों गुजरने के बाद इस प्रतिमा को तालाब से निकालकर इस मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा की गई भगवान विष्णु की मूर्ति गहरे काले रंग की है जिसे अति सुंदर मूल्यवान कपड़े व आभूषण पहनाए गए हैं। यात्रा जारी है छोटे चारधाम  Uttarakhand ke Chhote Chardham Yatra

प्रतिमा के मस्तक में हीरा जड़ा हुआ है मूर्ति की परिक्रमा कक्षा में हनुमान जी , गणेश जी, लक्ष्मी, दानवीर कर्ण आदि की मूर्तियां हैं । लक्ष्मण मंदिर के पास स्थित भोग मंडी (Bhog Mandi) में भगवान विष्णु का भोग पकाया जाता है । भगवान को भोग लगाने के बाद यह प्रसाद भक्तजनों में बांटा जाता है।

मंदिर के पीछे धर्मशाल नाम से शिला स्थित है 1 कुंड मंदिर के बाएं तरफ स्थित है घंटाकर्ण, मंदिर के उत्तर में स्थित है गरुड़ जी की पाषाण प्रतिमा , पूर्व के मैदान में और लक्ष्मी जी का मंदिर दक्षिण दिशा में है लक्ष्मी जी का मंदिर गुंबद आकार है ।

बद्रीनाथ मंदिर खुलने का समय(Badrinath mandir gate opening Time)

बद्रीनाथ मुख्य मंदिर प्रातः 6:00 बजे पट खोले जाते हैं प्रातः 9:00 बजे से लेकर रात्रि 8:00 बजे तक महा अभिषेक होता है बद्री विशाल के मुख्य पुजारी को रावल जी नाम से संबोधित किया जाता है ।

बद्रीनाथ मंदिर में 9:15 बजे बाल बाल भोग चढ़ाया जाता है तथा 12:00 बजे महाभोग का भोग लगाया जाता है महाभोग लगने के बाद दोपहर में मंदिर के पट बंद किए जाते हैं उसके बाद 3:00 बजे मंदिर भगवान विष्णु की एकांत सेवा के लिए खुलता है और फिर मंदिर की विशेष पूजा शाम 6:00 बजे होती है इसके बाद रात्रि 8:00 बजे भोग लगाया जाता है और शयन आरती के बाद मंदिर के पट बंद किए जाते हैं।

बद्रीनाथ के अन्य दर्शनीय स्थल (Visiting Site’s in Badrinath)

बद्रीनाथ धाम में मुख्य मंदिर के अलावा कई अन्य दर्शनीय स्थल हैं । व्यास गुफा अद्भुत है इसे बाहर से देखने पर किताब की तरह एक चट्टान जैसी दिखाई पड़ती है जिसे व्यास पुस्तक कहा जाता है ।

मंदिर से कुछ दूर ही पंचतीर्थ ,तप्त कुंड, नारद कुंड, प्रहलाद कुंड, ऋषि गंगा व कर्म धारा स्थित है इन मंदिरों के पास कई झरने बहते हैं वसुंधरा , भीम शिला , नगला कुंड , सूर्य कुंड आदि भी देखकर मन पुलकित हो जाता है।

और इस तरह हमारी छोटे चार धाम Uttarakhand ke Chhote Chardham Yatra का यहां समापन होता है हमारी कामना है की हर पाठक को जीवन में एक बार अवश्य इन पुण्य तीर्थो की यात्रा करने का सौभाग्य प्राप्त हो।

चारधाम यात्रा में ध्यान रखने योग्य बातें ( chardham yatra things to keep in mind)

उत्तराखंड के इन छोटे चार धामों की यात्रा करने के लिए मई से अक्टूबर माह तक का समय अच्छा माना गया है क्योंकि नवंबर माह से मार्च तक बर्फ गिरने के कारण रास्ते बंद हो जाते हैं ।
पत्थर गिरते रहने कारण दुर्घटनाओं की आशंका रहती है जब मई में मंदिरों के पट खोले जाते हैं उस समय बर्फ की गिरना बंद हो जाती है और पहाड़ों पर हरियाली लहलहा उठती है ।

सितंबर अक्टूबर तक सर्दी बढ़ जाती है मई-जून के महीनों में भी यात्रा करने वालों को गर्म ऊनी कपड़े साथ में लेकर जाना चाहिए क्योंकि देश के मैदानी इलाकों में मई में गर्म लू चलती है जबकि इन पहाड़ियों में बर्फीली हवाएं ठिठुरा देती हैं ।

यात्रियों को Uttarakhand ke Chhote Chardham Yatra में चमड़े की बजाय कपड़े के जूते पहनना ज्यादा आरामदायक रहता है इससे इनके हल्के होने कारण चढ़ने में आसानी रहती है । वर्तमान में खाने पीने की वस्तुओं की कोई दिक्कत नहीं है फिर भी यात्री घर से बने सूखी मिठाइयां,नमकीन ,लड्डू ,चने इत्यादि साथ ले जाएं तो ज्यादा ठीक रहेगा कई बार मार्ग अवरुद्ध होने के कारण खाने पीने की चीजों में दिक्कत होने पर यह चीजें आपके काम आ सकती हैं।

बरसात और ठंड के कारण हल्की फुल्की बुखार जुखाम खांसी जैसी समस्याएं भी हो सकती है इसलिए जरूरत की Medicine साथ रखनी चाहिए।पहले यह यात्रा बहुत ही दुर्गम और कठिन थी ऋषिकेश से आगे सड़क का साधन नहीं था और यात्रियों को जंगल से होते हुए पैदल ही जाना पड़ता था इस दौरान कई यात्री जंगली पशुओं के शिकार होकर काल कलवित होते थे यात्रियों के ठहरने के स्थान भी नहीं थे।

आज पहाड़ियों को काटकर सड़के बनाई गई है यह सर के एक तरफ गहरी खाई और दूसरी तरफ कौन से पहाड़ और जंगल हैं यह हजारों वर्ष पुराने जंगल है दुर्गम घाटियां सघन वन बहुतायत में हैं वर्तमान में सड़के बनाने और बस्तियां बसाने के लिए इन जंगलों को काटा जा रहा है इन जंगलों में हजारों प्रकार की जड़ी बूटियां फल और फूल पाए जाते हैं ।

इन पर्वत शिखरों को गंधमादन कहा जाता है इन्हीं गंधमादन पर्वतों से ली गई जड़ी बूटियों से ही देवगण सोमरस बनाते थे । इन जंगलों में से जंगली गुलाब, तुलसी, कमल जैसे फूलों की मन प्रफुल्लित करने वाली सुगंध आती रहती है।

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हनुमान जी भी इन्हीं गंधमादन के पर्वतों से ओषधियां लेकर गई थे जिनके प्रयोग से वैध सुषेण ने लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा की। यह मुनियों और देवों की तपोभूमि है जिसमे आज के समय मानव का अनावश्यक हस्तक्षेप बहुत बढ़ गया है।

बाबा काली कमली वाला (Baba Kali kamliwala)

चारधाम यात्रियों की दुख तकलीफों को देखकर परमहंस बाबा काली कमली वाला ने सबसे पहले इन परेशानियों से छुटकारा दिलवाने के लिए प्रयास शुरू किए। बाबा ने सन 1937 Uttarakhand ke Chhote Chardham Yatra में बाबा काली कमली पंचायत क्षेत्र नामक सेवा संस्थान की स्थापना की और आमजन से सहयोग मांगा । जिसके बाद बाबा ने सर्वप्रथम ठहरने के लिए धर्मशालाएं बनवाना शुरू किया, पेयजल की व्यवस्था की, चट्टियां बनवाई ,दवाखाने खुलवाए ।Uttarakhand ke Chhote Chardham Yatra

धर्मशाला में बिस्तर बर्तन आदि इकट्ठा करवाएं ताकि भक्तजन आकर रुक सके और अपना खाना पका कर खा सकें । बाबा के प्रयासों से अनुमानित 90 धर्मशालाओं का निर्माण किया गया ।पहले लोग चार धाम यात्रा के नाम से ही भयभीत हो जाते थे और अधिकांश लोग जीवन के अंतिम वर्षों में ही जाते कि कुछ अनहोनी हो भी जाए तो दुनियादारी की जिम्मेदारियां अधूरी ना रहे क्योंकि मन में एक डर रहता था की इस यात्रा से लौट कर आएंगे भी या नहीं ।

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आज इन छोटे चारों धाम की यात्रा के मार्गों पर हर प्रकार की सुविधा और जरूरत के सामान की प्रचुरता है । वर्तमान में सरकारों द्वारा चौड़ी सड़कों और ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था पर निरंतर काम किया जा रहा है आधुनिक सुविधाओं में दिनोंदिन बढ़ोतरी हो रही है अभी यात्रा में आम भक्तों को जाने से डर नहीं लगता हर साल लाखों लोग इन मंदिरों में दर्शन के लिए पहुंचते हैं बढ़ते हुए परिवहन के साधनों सुविधाओं के विस्तार के कारण इन पहाड़ों पर भी भीड़ भाड़ हो रही है ।

यहां आधुनिक भौतिकवादी संस्कृति के कदम यहां पर पड़ चुके है जो यहां के पावन पवित्र व सात्विक माहौल को बिगड़ भी रहे हैं मुनाफे के चक्कर में प्रकृति से अंधाधुंध चेदचाड की जा रही है जो चिंताजनक है।

जो पहाड़ और तीर्थ सुनसान रहते थे गिने-चुने भक्तों तपस्या का डेरा होता था वहां आज भीड़ भाड़ धक्का-मुक्की है । आस्था के नाम पर पैसों की लूट मची हुई है फिर भी यह तपोभूमि है आस्था की जड़ें बहुत गहरी है इस धरती से विश्वास का संबंध है इस यात्रा पर निकले हुए हर व्यक्ति के मन के तार इसी आस्था की भावना से जुड़े होते हैं ।

हर यात्री की मंजिल एक होती है सभी यात्री आज भी एक दूसरे की मदद करते हुए अपना दुख सुख भूलकर साथी अनजान यात्री की मदद करते हैं सब की भावनाएं एक होती है । कर्नाटक के भक्तों के नारे पर बंगाल का यात्री जयकारा लगाता है तो आप देखते हो कि भारत सदियों से एक था आज भी एक है यह हमारे पूर्वजों की भूमि है उन्हीं के पैरों के निशान पर हम आज भी चल रहे हैं ।

इस पुण्य भूमि पर हर साल बर्फ जमती है और बर्फ पिघलने के बाद इस धरती पर आस्था की नदियां बहती है भक्त बारंबार इस तपोभूमि के पावन दर्शन के लिए आते रहते हैं यह धाम पवित्र प्रकृति की अप्रतिम सुंदरता के भंडार हैं और आदि शंकराचार्य की भावना के अनुरूप हमारी राष्ट्रीय एकता के प्रतीक ।

हर हर महादेव
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