Best Purani Kahani in Hindi आचार्य चतुर सेन की प्रसिद्ध कहानी मंदिर का रखवाला

Purani kahani in hindi । आचार्य चतुर सेन की प्रसिद्ध कहानी “मंदिर का रखवाला”

आचार्य चतुर सेन 

ऐतिहासिक कथा साहित्य के महान शिल्पी आचार्य चतुरसेन शास्त्री की गिनती हिंदी के श्रेष्ठ कहानीकारों में होती है
आचार्य चतुरसेन शास्त्री का जन्म सन 1891 में बुलन्दशहर , उत्तरप्रदेश में हुआ था इनके पिता का नाम केवलाराम व माता का नाम नन्ही देवी था।आचार्य चतुर सेन की प्रसिद्ध Purani kahani  [मंदिर का रखवाला]
जन्म के चार वर्ष बाद से जीवनपर्यंत इन्होंने दिल्ली शाहदरा में निवास किया।1906-07 से इन्होंने पढ़ाई लिखाई शुरू की आगे चलकर DAV कोलेज लाहौर में आयुर्वेद के शिक्षक भी बने कुछ समय अजमेर में “कल्याण ओषधालय”का संचालन भी किया था।

अध्ययन का कार्य जीवनपर्यंत चलता रहा आजीविका के लिए वह वैध का कार्य किया करते थे।
आचार्य जी ने लगभग 450 कहानियों,30 उपन्यास व कई नाटकों सहित लगभग 175 ग्रंथो की रचना की थी।
2 फरवरी 1960 को इस महान आयुर्वेदाचार्य व कहानीकार का निधन हो गया।

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जीवन परिचय

सन 1917 का साल इनकी जिंदगी में एक सुखद महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आया इस साल उन्होंने “दुखवा मैं कासे कहूं” कहानी लिखी और यह कहानी सदैव के लिए अमर हो गई जिसकी आचार्य ने कल्पना भी नहीं की थी उस समय इनकी आर्थिक हालत भी ठीक नहीं थी तो इस कहानी से मिले पांच रुपए पारिश्रमिक से इन्होंने पत्नी के साथ सेलिब्रेट किया।

“हृदय की परख” इनका पहला उपन्यास था और पहली कहानी “सच्चा गहना” नाम से प्रयाग कि ग्रहलक्षमी पत्रिका में छपी जिसके बाद कविताएं लिखना छोड़ पूरी तरह कहानीकार ही बन गए उस समय की सभी प्रसिद्ध पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं छपती थी।

इनकी कहानियों में समाज की सच्ची तस्वीरें होती थी और वह दोस्तों, जानकारों कों देखकर समझ कर,घूम कर कहानी के आइडिया निकालते वैध के पेशे के कारण भी इन्हें बहुत सी कहानियों के जीवंत आइडिया मिलते जो पाठक को सीधा कनेक्ट करते।ऐतिहासिक कहानियों में आचार्य जी का अध्ययन व शोध साफ साफ नजर आता है।

प्रमुख रचनाएं

“दूखवा मैं कासे कहूं ,अंबापालिका,पतिता,नवाब ननकु,दे खुदा की राह” जैसी कहनियां व “सोमनाथ”,”वैशाली की नगरवधू” जैसे उपन्यास आचार्य चतुर सेन कि वह जीती जागती कालजई रचनाएं हैं जो पाठकों के मन पर सदैव के लिए अमिट छाप छोड़ जाती हैं।आचार्य लाला लाजपत राय से बहुत प्रभावित थे उनकी जेलयात्रा के दौरान इन्होंने लालाजी पर कविता लिखी थी।

बंगाल विभाजन के बाद अंग्रेजो के बढ़ते जुल्म को देखकर आचार्य का युवा मन भी विद्रोही हो उठा जिसकी झलक इनकी रचनाओं में साफ दिखती हैं।

आचार्य जी ने अनेक उपन्यासों की अतिरिक्त उन्होंने करीब 450 कहानियां लिखी।इन कहानियों में से बहुत सी अपने शिल्प, कथ्य के कारण यादगार बन गई इनकी कहानियों में सामाजिक, ऐतिहासिक और तत्कालीन समस्या प्रधान सभी तरह के विषयों को अत्यन्त प्रभावी व रोचक तरीके से दिखाया गया है।आचार्य जी की कहानियों में सत्यम मार्मिक रूप से छिपा रहता है जो पाठक के मन मस्तिष्क को उद्वेलित करता है आचार्य चतुरसेन की कहानियां मानव मात्र के कल्याण की कहानियां है।

आचार्य चतुरसेन हिंदी कथा लेखन के मजबूत स्तंभ माने जाते हैं आलोचक भी इनकी रचनाओं को नकारने में असहज महसूस करते थे इनकी लगभग सभी कहानियां सरल,सुबोध और रोचक शैली लिए होती हैं कि पाठक एक बार शुरू करने के बाद पेज दर पेज पढ़ता ही चला जाता है।

ऐतिहासिक घटनाओं और प्रसंगों को पढ़कर वह आश्चर्यचकित होता है क्योंकि इन कहानियों में दिए गए किस्सों व घटनाओं को या तो वह जानता ही नहीं था या कभी उन पर ध्यान ही नहीं दिया था।
आचार्य की हर रचना अपने आप में अद्भुत और अनुपम है इतना समय बीत जाने के बाद भी एक किवदंती बने हुए हैं।

पेश है आचार्य जी की एक प्रसिद्ध कहानी जो मुगल बादशाह ओरांगजेब के शासन के दौरान बुंदेलखंड के एक मंदिर को आधार बनाकर लिखी गई है और बादशाह के एक सिपहसालार द्वारा चतुर्भुज जी के एक प्राचीन मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाने के इरादों को नाकाम करने के बारे में बताती हुई अति नाटकीयता व रोमांचक तरीके से पाठकों को बांधे रखती है।

मंदिर का रखवाला

ओरछे के विशाल चतुर्भुज मंदिर के प्रांगण में कुछ वीर पुरुष बैठे थे।फाटक के भारी भारी किवाड़ बंद थे और द्वार पर पहरे लगे थे किसी भी व्यक्ति को भीतर जाने की आज्ञा नहीं थी|ओरछा में बादशाह आलमगीर के सेनापति रणदुलहखा आकर ठहरे हुए थे उन्होंने रियासत का प्रबंध हाल ही में अपने हाथों में लिया था| ओरछे के राणा चंपत राय के वीरगति प्राप्त होने के बाद उनका अति अल्पवयस युवक पुत्र अज्ञातवास कर रहा था फलत ओरछा शाही आलम दारी में था|

रण दूल्हा खान की आज्ञा हुई थी कि आज तीसरे पहर इस चतुर्भुज के मंदिर को तोड़कर उसके स्थान पर एक मस्जिद बना दी जाए|
नगर में इस खबर से बड़ी बेचैनी फैली हुई थी लोग दुख और क्रोध में भरे थे परंतु शाही सेना के अत्याचार का प्रतिवाद करने की शक्ति उनमें नहीं थी वे अपना शोक मन ही मन में दबाए लहू का घूंट पी रहे थे|

इस मंदिर में जो वीर एकमात्र थे उन के बीचो बीच एक तपस्वी साधु मूर्ति थी इनके प्रशांत और तेजस्वी मुख पर एक अलौकिक प्रभा थी और वे थे प्राणनाथ प्रभु यह बुंदेलखंड के एक महा प्रताप और महा माननीय देशभक्त साधु एवं चमत्कारी पुरुष थे शेष व्यक्ति ओरछे के प्रमुख सरदार और प्रधान धनपति थे यह इनकी अत्यंत गोपनीय सभा थी|

ओरछे के सभी मंदिर ढहा दिए गए थे पर सब को आशा थी कि वह मंदिर नहीं गिराया जाएगा पर जब यह खबर लोगों ने सुनी तो उन पर वज्रपात हुआ हुआ मंदिर की रक्षा का कुछ भी उपाय ना था सूर्योदय से ही झुंड के झुंड नागरिक चतुर्भुज के अंतिम दर्शन करने के लिए एकत्रित होने लगे थे सारे नगर में दुख का रोना शोक कि ध्वनि और आत्म निंदा के वाक्य सुनाई दे रहे थे|

उस दिन नगर वासियों ने अन्न जल त्याग दिया था|लोगों में छुपे छुपे यह चर्चा भी चल रही थी कि प्राणनाथ प्रभु आ गए हैं इस खबर से लोगों के हृदय में आशा का संचार हुआ परंतु मंदिर के पट प्रातः काल से ही बंद थे और आज चतुर्भुज भगवान को भोग नहीं लगा था यद्यपि लोगों को यह गुमान न था प्राणनाथ प्रभु भीतर बैठे परामर्श कर रहे हैं

फिर भी झुंड के झुंड लोग मंदिर के चारों ओर खड़े थे भीतर जो लोग एकत्रित थे उनमें से एक ने कहा:” देखिए अब मामला यहां तक पहुंच गया है कि हमें कुछ ना कुछ करना चाहिए|

” यह व्यक्ति बड़े डीलडोल का बदसूरत और भयानक चेष्टा वाला था उसकी आकृति बाज पक्षी के समान थी उसकी आंखें गहरी और डरावनी थी उसके शरीर पर युद्ध के पूरे समान थे|जो लोग वहां बैठे थे उनके चेहरे क्रोध से तमतमा रहे थे उन पर दृष्टि डालकर उसने भयानक दृष्टि से सब को घूरते हुए कहा:” सरदारों क्या बुंदेलखंड हम बुंदेली का नहीं है और यह मंदिर क्या स्वर्गीय राजा चंपत राय की विजय कामनाओं का केंद्र नहीं रहा क्या आप भूल गए कि उस वीर ने विधियों पर विजय करके किस प्रकार इसकी देहली पर मस्तक टेका था|

भाग्यवान तो वीरगति को प्राप्त हुए और हम उनके दरबारी और सरदार हैं तो क्या इसलिए कि चुपचाप उनकी दी हुई जागीर को खाते रहे क्या हमने कभी यह भी विचारा है कि हमारी पीढ़ियों से चली आती हुई अजय शक्ति कहां चली गई और हम उसे कुकर किस उद्देश्य से जी रहे हैं और जागीर भोग रहे हैं|

“श्रोता गण सिर नीचा किए चुपचाप बैठे थे उन्होंने फिर कहा और आपको मालूम है कि हमारे और औरछे के और समस्त बुंदेलखंड के सिर पर लात मारकर जो अधिपति बनकर आए हैं वह कौन है मुझे कहते हुए घृणा होती है कि वह ना उच्च कुलीन है और ना कोई सज्जन या वीर पुरुष है वह एक पतित और दुष्ट प्रकृति के व्यक्ति हैं परंतु उनकी विशेषता यही है कि उनकी पुत्री को शाही खिदमत बजा लाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ बस यही उनकी योग्यता है यह सारंगी बजाने का काम करते थे समझे आप सारंगी बजाने का आप क्या कहते हैं क्या आप लोग उस अदम पुरुष की प्रजा बनकर रहेंगे?

सरदारों! उसने अपने लोहे के दस्ताने पहने हुए एक हाथ को दूसरे हाथ पर रखते हुए कहा- इस कमीने के अधीन जो ने प्रतिष्ठित है और नए योग्य किंतु बादशाह है की कृपा से वह हमें अपने स्वेच्छाचारीता से जेर करना चाहता है क्या हमें सब सहते रहना उचित है? इस गंदे घास फूस को क्या हम उखाड़ कर फेंक ना दे और अपना मार्ग साफ करें?

सज्जनों! मैं आप सब से पूछता हूं आपका उत्तर क्या है?
सब एक स्वर में चिल्ला उठे- अवश्य, भले ही हमें प्राणों की बाजी लगाने पड़े प्रत्येक पुरुष क्रोध और आवेश में बोल रहा था और गुंबद में उनकी ध्वनि प्रतिध्वनि तो हो रही थी| एकमात्र प्राणनाथ प्रभु शांत बैठे थे|
अब वह बोले

उन्हें बोलने का उपक्रम करते देख सभी चुप हो गए| प्राणनाथ ने हंसकर: कहा यह सब तो ठीक है पर म्याऊं का ठौर कौन पकड़ेगा? कहो, किसमें है इतना साहस?

सर्वत्र सन्नाटा हो गया इस मंडली में एक कोने में एक अल्पव्यस्क बालक बैठा था यह अपरिचित एवं विदेशी था इसे प्राणनाथ प्रभु की सिफारिश पर इस गुप्त सभा में सम्मिलित किया गया था|उसने धीरे से मुस्कुरा कर कहा:” यदि प्रभु का हुक्म हो तो यह सेवा यह तुच्छ सेवक करेगा”
प्राणनाथ प्रभु हंस दिए सभा ने विस्मित होकर देखा यह अद्भुत और मृदुल बालक कौन है?

एक व्यक्ति ने झरोखे में से झाककर देखा और चिल्ला कर कहा- देखो वह आ रहा है|
सब लोगों ने झरोखे में से देखा-सवारों का एक दल हथियारों से सुसज्जित आ रहा है| एक तुच्छ आदमी बहुमूल्य और भड़कीले वस्त्र पहने एक अरबी घोड़े पर सवार सबके आगे चला आ रहा है एक प्यादा उस रकाब के साथ हुक्का लिए और दूसरा पायदान लिए आगे बढ़ रहा है उसके पीछे 500 सवार हथियारों से लैस आ रहे हैं|

इस गर्वीले दल को देख यह छोटी सी मंडली दांत पीसने लगी|
बाहर कोलाहल होने लगा सभी मनुष्य चित्कार कर उठे |
मंदिर के सीमा द्वार पर भारी भारी चोटे पड़ने लगी| सभी लोग द्वार पर आकर एकत्र हो गए
प्राणनाथ प्रभु ने कहा : देखो सभी लोग संयम में रहना शीघ्रता न करना मैं और यह सुंदर युवक सब कुछ ठीक कर लेंगे अभी तुम सब लोग भीतर ही रहो|

यह कहकर प्राणनाथ प्रभु सिंह द्वार पर आकर बोले: तुम कौन हो ?
‘मैं सिपहसालार रणदूल्हेखान, हूं द्वार खोल दो’
‘ द्वार खुलवाने का उद्देश्य क्या है?’

आप पढ़ रहें हैं आचार्य चतुर सेन की प्रसिद्ध Purani kahani  [मंदिर का रखवाला]

‘मैं भीतर जाऊंगा |’
‘ किस लिए?’
‘ मैं बुतशिकन हूं | मैं मंदिर को ढहा दूंगा, मूर्ति को तोडूंगा |’
‘यह काम तुम किसकी आज्ञा से करते हो?’

‘ अपनी आज्ञा से|’
‘ और यदि द्वार न खोले जाए तो?’
‘ तो जबरदस्ती दरवाजा तोड़ दिया जाएगा |’
‘ बल प्रयोग का प्रयोजन नहीं, मैं द्वार खोलता हूं |’

Purani Kahani

इसके बाद प्राणनाथ प्रभु ने फाटक की भारी सांकल पर हाथ डाला – एक भयानक चित्कार करके द्वार खुल गया|प्राणनाथ प्रभु अपना भगवा परिधान पहने बाहर निकल आए|

तत्क्षण एक प्रचंड जयघोष हुआ| सभी नर-नारी चिल्ला उठे ‘प्राणनाथ प्रभु की जय!’
रणदुल्हखान उस सतेज मूर्ति को आगे बढ़ते देख पीछे हट गया |प्रचंड जयघोष से वह घबरा गया |परंतु तुरंत अपने साहस का संचार कर के उसने कहा:’बागी तू कौन है, और क्यों तूने इतनी भीड़ लगा रखी है?’प्राणनाथ प्रभु एक शब्द भी ना बोले | वह चुपचाप खड़े रहे| रणदुल्हेखान ने क्रोध में पागल होकर कहा:’ अरे गुस्ताख ,पूछता हूं और जवाब नहीं देता ! ठहर मैं अभी तेरा सिर भुट्टे से उड़ाता हूं |’यह कहकर और तलवार खींचकर वह आगे बढ़ने लगा |

प्राणनाथ ने वज्र गर्जन करके कहा :’वही खड़ा रह!’दूसरे ही क्षण मंदिर में से अनेक वीर निकलकर प्राणनाथ प्रभु के पीछे आ खड़े हुए| उन्होंने तलवारे सुत ली|रणदुल्हेखान ने फिर से साहस संग्रह किया| उसने कहा : ‘समझ गया तुम प्राणनाथ गुस्साई है, जो तमाम मुल्क में बगावत फैलाता फिरता है|’प्राणनाथ प्रभु बोले नहीं वजर् दृष्टि से देखते रहे|रणदुल्हेखान ने फिदाईखान फौजदार को हुकुम दिया:
‘क्या देखते हो, इस बागी की गर्दन एक ही हाथ में उड़ा दो|

‘परंतु फिदाई खान की हिम्मत नहीं हुई| उसने अपने एक हवलदार से कहा -हैदर खान,तलवार के एक ही हाथ से इस गुसाईं का सिर धड़ से अलग कर |रणदुलेखान ने जो काम फिदाई खान को सौंपा था, फिदाई खान ने वह काम हैदर खान को सौंप दिया |यह देखकर प्राणनाथ प्रभु मुस्कुरा दिए |उन्हें मुस्कुराता देख हैदर खान ने एक सिपाही से कहा:
‘ मोहम्मद खान, खान साहब का हुक्म बजा लाओ, और एक ही हाथ में इसका सिर भुट्टे की भांति उड़ा दो|’

मोहम्मद खान ने तपाक से कहा-‘ वल्लाह, हुजूर की मौजूदगी में एक काफीर का कत्ल करू? मुझसे हरगिज यह गुस्ताखी नहीं होगी |जनाब एक ही हाथ में इस बदनसीब का सिर कला मुंडी खा जाएगा |’रणदल्हखान यह देख कर कुढ गया| पर यह समझ गया कि इस गुसाईं पर हाथ डालना साधारण आदमी का काम नहीं है| उसने होठों को दांतो से दबाकर तलवार सुत ली और आगे बढ़ा |
हजारों की संख्या में खड़े नर नारी विचलित और उत्तेजित हो उठेप्राणनाथ प्रभु ने फिर गर्दन से कहा: ‘खबरदार सब लोग शांत खड़े रहे |’
रणदूल्हे खान थरथर कांपने लगा और उसने आगे बढ़ कर कहा:’ गुस्साई मरने को तैयार हो जाओ!’

‘ मूर्ख, मैं अभी नहीं मरूंगा |’
रणदुल्हखान ने तलवार ऊपर उठाई| प्राणनाथ प्रभु वजर् की भाती खड़े थे|
अब वह युवक तेजी से मंदिर से निकला और प्रभु के सामने आकर महीन किंतु तीव्र स्वर में बोला :
‘खामोश रण दूल्ह खान ,तलवार जमीन पर रख दो और इस बुजुर्ग से दस्तावस्ता माफी मांगो|’

‘ तुम कौन है, तेरी हिम्मत पर आफरीन है! हट जा बच्चे, वरना यह तलवार तेरे खून से पहले ही शुरू होगी ,क्या तू सिपहसालार रण दूल्हे खान के गुस्से को जानता नहीं ?युवक जोर से खिलखिला कर हंस पड़ा| इसके बाद उसने अपने सिर की पगड़ी उतार कर फेक दी| एडी तक लटकने वाली सघन काली घुंघराले बालों की केस राशि बिखर गई |

उसने दर्प से कहा:
‘ पीछे हट जा ,शहजादी बदर्निस्सा तुझे हुकुम देती है कि अपनी तलवार जमीन पर रखकर झटपट इस बुजुर्ग से माफी मांग |’

रणदूल्हे खान का चेहरा पीला पड़ गया |वह थरथर कांपने लगा| उसने तलवार शहजादी के चरणों में रखद और कहा :’हुजूर गुलाम की गुस्ताखी माफ फरमाए जाए ,हुजूर को मैं पहचान…..
‘ इस तरह तुम डाकू और बदमाशों की तरह शहंशाह कि रियाया पर जुल्म करते हो?’
‘ हुजूर ….’
‘पहले उस बुजुर्ग से माफी मांगो|’
रणदुल्हखान घुटनों के बल बैठकर प्राणनाथ प्रभु के चरणों पर गिर गया |

प्राणनाथ हंस पड़े और हाथ उठाकर उसे अभय किया|
फिर प्रचंड जय घोस हुआ-
‘ प्राणनाथ प्रभु की जय’
प्राणनाथ ने कहा-
‘ रण दूल्हे खान तुम यदि बादशाह के सच्चे सेवक हो, तो तुम्हें कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे प्रजा के मन में शहंशाह के प्रति क्रोध या घृणा उत्पन्न हो |

तुम्हारी नमक हलाली शान गाठने और अत्याचार करने में नहीं, शहंशाह के प्रति प्रजा के हृदय में प्रेम पैदा करने में है| कोई राजा बल से देर तक प्रजा पर हुकूमत नहीं कर सकता जब तक कि वह उसका दिल न जीत ले जाओ भविष्य में ऐसी चेष्टा करना की शहंशाह और ईश्वर दोनों की नजर में तो गुनहगार ना बनो |रण दूल्हा खान जल्दी-जल्दी शहजादी और प्राणनाथ प्रभु को बार-बार सलाम कर अपनी फौजी सहित चला गया और इस अतकिर्त रीती से मंदिर की रक्षा होते देख लोग बारंबार हर्षनाद करने लगे अब भी ओरछा के वृद्ध इस मंदिर रखवाले की कहानी बड़े चाव से कहा करते हैं|

[कहानी समाप्त]

आचार्य चतुर सेन की पुस्तकें कैसे प्राप्त करें

हिन्द पॉकेट बुक्स, डायमंड पॉकेट बुक्स आदि प्रकाशनों ने “आचार्य चतुर सेन की श्रेष्ठ कहानियां” नाम से इनकी बहुचर्चित और कलासिक का दर्जा रखने वाली कहानियों को प्रकाशित किया है ये चुनिंदा रचनाएं इनके सम्पूर्ण कथा संसार का प्रतिनिधित्व करती हैं।
आचार्य की Purani Kahaniyon,रोचक व ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाली की पुस्तकें व उपन्यास और कथाओं को विभिन्न प्रकाशनों ने समय समय पर प्रकाशित किया है जिन्हे आप अमेजन,सनेपडिल जैसे प्लेटफॉर्म से ऑनलाइन घर बैठे मंगवा सकतें हैं अथवा नजदीकी पुस्तक भंडार से प्राप्त कर सकते हैं।

आशा करते हैं की उपरोक्त लेख में दी गई कहानी व आचार्य चतुर सेन के जीवन परिचय व रचना संसार की जानकारी आपके लिए ज्ञानवर्धक रहेगी|लेख आपको कैसा लगा कमेंट कर अवश्य बताएं और पोस्ट शेअर जरूर करें|

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