Karnal Sajjan Ki Laddakh Dairy | 80 साल पहले की साहसिक लद्दाख यात्रा | Risk In Laddakh Tour

Karnal Sajjan Ki Laddakh Dairy, 80 साल पहले की साहसिक लद्दाख यात्रा, Risks In Laddakh Tour In Hindi

“बौद्ध महिलाएं क्या मुसलमान से शादी कर लेती है निकाह के लिए उन्हें मुसलमान बनना पड़ता होगा” मैंने पूछा
रमजान खान बोला की पहले तो साहब लोग के नौकर वैसे ही औरतों को भगाकर ले जाते थे क्योंकि यहां के लोग बहुत भोले हैं उन्हें क्या मालूम कि कहीं पर 116 डिग्री गर्मी भी पड़ती है अगर कोई पंजाब जाकर गर्मी से मर भी गई तो भगानेवाले की बला से।
बहुत सी ओरतें तो पंजाब और कश्मीर में बेच दी जाति थी।आप पढ़ रहे हैं Lieutenant Karnal Sajjan ki laddakh dairy ,80 साल पुरानी “आजादी” से पहले की गई खतरनाक लद्दाख यात्रा

एक ओरत के बहुत से पति होने के कारण बहुत सी बौद्ध लड़कियां कुंवारी राह जाती थी जिन्हे भगा ले जाना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है।
बौद्ध धर्म के हिसाब से केवल बड़े लड़के को जायदाद मिलती है वहीं विवाह करता है उसकी पत्नी सभी भाइयों की पत्नी होती है लेकिन उनसे जितने भी बच्चे हो सभी बड़े भाई के ही कहलाते हैं।

यदि शादी करने के लिए कोई छोटा भाई धर्म परिवर्तन करता है तो वह और उसकी पत्नी दोनों को घरों व जाति से बेदखल कर दिया जाता है जिसके बाद उन्हें मजदूरी करके पेट पालना पड़ता है इसी कारण जितने भी बौद्ध हैं सभी के पास जमीनें हैं लेकिन दूसरे धर्म वाले मजदूरी या छोटा मोटा व्यापार ही करते हैं।

लकड़ी की जगह “टट्टी” (Lakdi Ki Jagah Tatti Ka Use)

“लेह पहुंचकर एक महिला के घर 12 आना रोज के किराए पर रुकने की व्यवस्था की गई वह महिला पीठ पर “ठोकनी” में सुखी हुई “टट्टी”(मानव मल) इक्कठा कर रही थी और गीली टट्टी को दीवारों के पास फेंक रही थी ।
कर्नल के साथी दाऊ साहब को इससे बहुत घिन आई।

उनके वहां पहुंचने पर वह महिला भी सामान उतारने,बिस्तर लगाने आदि में मदद करने लगी लेकिन जब दाऊ साहब ने देखा तो बहुत नाराज़ हुए की बिना हाथ धोए मेरे सामान को छुआ क्यों हाथ क्यों लगाया।

“नाराज मत होइए यहां लद्दाख में लकड़ी की बहुत कमी है इसलिए हमे सुखी हुई “टट्टी” जलानी पड़ती है इसीलिए मैनें सुखी हुई को इक्कठा कर गीली टट्टी को दीवार के साथ बिखेर दिया है सूखने पर उठा लूंगी हमें पता है हिंदुस्तान में इससे बहुत नफरत करते हैं लेकिन अच्छी बात ये है कि इससे में आज नहा पाऊंगी” कहते हुए वह हंसकर चली गई।”

Laddakh Dairy (लद्दाख डायरी)

ऊपर दिए गए दो प्रकरण कर्नल सज्जन सिंह कि स्वयं के अनुभवों के आधार पर लिखे गए यात्रा वृतांत “लद्दाख यात्रा की डायरी” नामक पुस्तक से लिए गए हैं यह साहसिक यात्रा लेखक के अपने एक मित्र के साथ आज 80 वर्ष पहले सन 1939 की गर्मियों में अंजाम दी गई थी ।

आज के अतिआधुनिक युग के मुकाबले उस समय यातायात व संचार के उन्नत साधनों का घोर अभाव था ऐसी हालत में इस प्रकार की यात्रा के लिए पर्याप्त अच्छी साधन सुविधाएं जुटा पाना हर किसी के बस की बात नहीं थी।

लेह लद्दाख का नाम आज का बच्चा बच्चा जानता है आप सभी भी परिचित होंगे मुख्य भौगोलिक व जलवायु सम्बन्धी चुनौतियों को छोड़ दे तो वर्तमान समय में लद्दाख घूमना बहुत आसान हो गया है खासकर युवा वर्ग में बाइक लेकर लेह लद्दाख घूमना बहुत ट्रेंड कर रहा है ।

पहाड़ों दर्रों से भी शानदार सड़कें बना दी गई हैं यातायात के असीमित विकल्प हैं यदि आप कभी घूमने ना भी गए हों तो भी कोई दिक्कत नहीं बहुत सी टूर एजेंसियां आपके आने जाने से लेकर रहने खाने तक की व्यवस्था एक निश्चित रकम लेकर आराम से कर देती है पर ये भी सत्य है की तकनीक साधन व संसाधन भले ही कितना उन्नत हो गए हो पर लद्दाख यात्रा आज भी आसान नहीं है।

लेकिन क्या हम सोच सकते हैं कि आज से कोई 70-80 साल पहले लेह लद्दाख घूम कर आना कितना संघर्षपूर्ण हुआ करता था आजादी से पहले ऐसी दुर्गम और संवेदनशील रियासतों में जाने के कितने कड़े नियम व प्रोटोकाल होते थे क्योंकि इस समय आज कि तरह हर व्यक्ति कहीं भी पर्यटक की तरह नहीं घूम सकता था ।

इसके लिए आपको मोटर,नोकर,घोड़ा,खच्चर,भोजन जैसी जरूरतों के लिए बहुत सा पैसा तो खर्च करना ही पड़ता था साथ ही टूर से जुड़ी अनुमति व सुरक्षा सम्बन्धी बहुत सी कठिन व थका देने स्वास्थ्य सम्बन्धी व ऑफिशियल फॉर्मेलिटी पूरी करनी पड़ती थी जिसके लिए आपके राजनीतिक व प्रशासनिक दोनों तरह के उच्च स्तर की जान पहचान होना भी बहुत आवशयक होता था।

यह यात्रा 1939 में की गई थी जब देश गुलाम था और प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भी कई विवशताओं का सामना करना पड़ता था।

लद्दाख यात्रा की मुश्किलें ( Problems with laddakh Tour)

इस पुस्तक से अप जानेंगे कि लद्दाख यात्रा करने के लिए कितने परिश्रम,संयम

और सहनशीलता की जरूरत पड़ती है बहुत बार बड़े बड़े अनुभवी लोगों की हिम्मत जवाब दे जाती है।

पुस्तक के लेखक शिकार खेलने के उद्देश्य से लद्दाख के बंजर और जनशून्य प्रदेश में गए थे साथ ही उन्होंने लद्दाख की प्राकृतिक सुंदरता,रहन सहन, आम व्यवहार का विस्तार से वर्णन किया है।

लद्दाख डायरी के लेखक (Writer Of Laddakh Dairy)

लेखक लेफ्टिनेंट कर्नल सज्जन सिंह की लेखन शेली प्रभावित करती है रोचक है आंखोदेखा वर्णन किया गया है कि पाठक खुद को लद्दाख में उपस्थित महसूस करता है

पुस्तक की खास बात यह है कि इसमें लेखक यात्रा का बिल्कुल यथार्थ वर्णन करते हैं बिना किसी कल्पनशीलता ओर नाटकीयता के साकार दृश्य प्रस्तुत करते हैं।लेखक जब यात्रा पर निकले थे उस समय वह ओरछा राज्य के दीवान थे लेकिन देश आजाद हो जाने पर ओरछा का विलय विंध्य प्रदेश में हो गया जिसके बाद उन्होंने वर्तमान के मध्यप्रदेश के मंदसौर पर आजीवन निवास किया।

पुस्तक Lieutenant Karnal Sajjan ki laddakh dairy,80 साल पुरानी

 

“आजादी” से पहले की खतरनाक लद्दाख यात्रा पहली बार “लद्दाख यात्रा की डायरी” के नाम से सत्साहित्य प्रकाशन,नई दिल्ली द्वारा सन 1955 में प्रकाशित की गई थी जिसकी उस समय कीमत ढाई रुपए रखी गई थी साल और इस कीमत के बारे में सोचना ही रोमांचक लगता है।

लद्दाख यात्रा का फैसला क्यों लिया (Laddakh Yatra Ka Faisla)

 

कर्नल सज्जन सिंह एक रोचक किस्से के साथ बताते हैं कि उन्होंने किस कारणवश लद्दाख जाने का फैसला किया।
जून 1936 में एक दिन लेखक रायपुर MP से शिकार खेलकर लौटे और ओरछा महराज को अपनी शिकार यात्रा का हाल सुनाया।

इस समय वहां दो तीन अंग्रेज महिला पुरुष भी बैठे थे जब लेखक ने बताया कि उन्होंने एक अर्ना भैंसे का शिकार किया था लेकिन मध्यप्रदेश में अरना भेंसा मारना मना है इसलिए वन विभाग ने उनसे भेंसे की खाल सिंग आदि जब्त कर लिए और मुकदमा भी दर्ज कर लिया।

तब अंग्रेज  महिला ने उनसे पूछा कि क्या आपको शिकार का शौक है।
कर्नल ने कहा हां शौक तो बहुत है लेकिन कभी अच्छे से अवसर नहीं मिल पाया ढंग से शिकार खेलने का।कर्नल और ओरछा महाराज दोनों ने इच्छा जाहिर की कि वह देश भर के जानवरो की ट्रॉफियों(जानवरों के सींग,दांत,खाल आदि)का अच्छा संग्रह करना चाहते हैं ।

उनकी इस बात पर अंग्रेज महिला ने उन्हें ताना देते हुए कहा की आप चाहे जिस जानवर का शिकार कर लें लेकिन लद्दाख में शिकार और उसमे भी “ओविस अमोन”(तिब्बत की बड़ी जंगली भेड़ जिसे लद्दाख में न्यान कहा जाता है) का शिकार आपके बस की बात नहीं है।

लद्दाख में शिकार की धुन (Hunting In Laddakh)

Karnal Sajjan Ki Laddakh Dairy 80 साल पहले की साहसिक लद्दाख यात्रा

उस महिला की बात लेखक और ओरछा महाराज दोनों को बहुत चुभी लेकिन उस समय उन्होंने खुद पर किसी तरह काबू पाया।लेकिन लेखक पर लद्दाख जाने की धुन सवार हो गई उन्होंने तिब्बत और लद्दाख पर हर संभव उपलब्ध पाठ्य सामग्री मंगवाकर पढ़ना और अधिकतम जानकारी जुटाना शुरू कर दिया।

इसी के साथ अपने उच्चाधिकारी मित्रों के सहयोग से लद्दाख जाने का जुगाड बैठने लगे अपने मित्र मेजर केंपबेल के सहयोग से उन्होंने लद्दाख जो उस समय कश्मीर स्टेट में पड़ता था का शिकार परमिट प्राप्त करने में जुट गए क्योंकि तिब्बत में शिकार करने पर बिल्कुल पाबन्दी थी।

लद्दाख में शिकार की इजाजत (Laddakh Main shikar ki parmition)

मेजर केमपबेल और लेखक कर्नल सज्जन सिंह के सामूहिक प्रयासों के बाद आखिर दो साल की मेहनत से दिस 1938 में जाकर लद्दाख यात्रा व शिकार परमिट की व्यवस्था हो गई जिसमें 27 प्रकार के जानवरों के शिकार की अनुमति दी गई थी।

कर्नल साब का परमिट 10 अप्रैल 1939 से 10 नवम्बर 1939 के समय तक का था आखिरकार यात्रा के जरूरी सामान जिनकी जानकारी उपलब्ध पुस्तकों से मिल पाई थी को (थर्मामीटर,कंपास,थर्मस,स्टोव,दवाइयां,काले चश्मे,दस्ताने, कीलों लगे मोटे जुटे,गर्म पानी की रबर की थैलियां आदि ) बंबई से खरीदा गया और साथ चलने के लिए अपने एक मित्र कुंवर हरवल सिंह को राजी किया।

लद्दाख का कठिन सफ़र (Laddakh Ka Safar)

फिर शुरू हुई इनकी वह लद्दाख की रोचक दुर्गम यात्रा जो इन्हे हर रोज पेश आने वाली नई चुनौतियों के साथ जीवन में बहुत से अनुभवों से पहली बार सामना करवाने वाली थी।
सफ़र पर साथ चलने वाले गाइड रमजान खान और उनके खानसामा जो लेह लद्दाख के हर हिस्से से भली भांति वाकिफ थे उन्हें घूमने, ठहरने से लगायत शिकार करने तक में पूरी पूरी सहायता करते हैं व आने वाली समस्याओं को अपने स्थानीय ज्ञान व संपर्क सूत्रों की मदद से दूर करते चलते हैं।

पुस्तक के हरेक अध्याय को पढ़ते हुए आपको लगेगा कि आप लेखक के साथ ही 40 के दशक में लद्दाख घूम व शिकार कर रहे हैं।
बिना किसी नाटकीयता और शब्दजाल के लेखक कश्मीर,लेह,लद्दाख सहित हिमालय का सचित्र वास्तविक खाका खींचते हैं।

लेह लद्दाख के प्राकृतिक संपदा के सुंदर दृश्य हो या वहां के निवासियों का रहन सहन व खान पान पुस्तक से प्रामाणिक जानकारी प्राप्त होती है ।लेखक ने वहां के पारिवारिक,धार्मिक व सामाजिक ताने बाने पर भी काफी कुछ स्वयं के अनुभव के आधार पर वर्णन किया है।
बौद्ध व मुस्लिम संप्रदाय के आपसी रिश्तों से लेकर धर्म परिवर्तन पर भी प्रकाश डालते हैं।

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Laddakh Yatra Ki Samapti (लद्दाख यात्रा की समाप्ति)

23 जून 1939 को दोनों यात्रियों ने टीकमगढ़ से यात्रा की शुरुआत की और भांति भांति के रोमांचक कष्ट पूर्ण पड़ावों को पार करते हुए वर्तमान पाकिस्तान के मरी,रावलपिंडी से होते हुए श्रीनगर,बारामूला से दिल्ली के रास्ते कभी खच्चर कभी मोटर और ट्रेन से सफर करते हुए आखिर 13 सितंबर 1939 को रोमांच मिश्रित थकान और अनगिनत रोंगटे खड़े कर देने वाले अनुभवों का खजाना लिए सही सलामत दोनों दोस्त टीकमगढ़ वापिस आए।

वर्तमान तकनीकी रूप से अतिउन्नत दौर में आठ दशक पहले के हालात और उस समय के उपलब्ध सीमित संसाधनों के बलबूते की गई इस दुर्गम यात्रा का विवरण पढ़ना आपके लिए सच में एक अनोखा अनुभव होगा।

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