गिरमिटिया जो कभी वापिस नहीं लौटे | Girmitiyon Ki Kahani Koolie Lines

200 साल का दर्द (गिरमिटिया जहाजी) Girmitiyon ki kahani

Coolie lines [कुली लाइंस] आज हम एक ऐसी किताब की बात करेंगे जिसे लिखा है श्री प्रवीण कुमार झा ने लेखक वर्तमान में नार्वे में निवासरत हैं।कुली लाइंस उन लाखों हिन्दुस्तानियों की जो एक बार भारत भूमि से विदा होने के बाद वापिस नहीं लौट पाए ।सभी के अलग अलग कारण रहे थे लेकिन कभी उन कारणों,उनके अंतहीन दर्द और उनकी आपबीती पर किसी ने चर्चा करना उचित नहीं समझा जिस प्यार और सम्मान के लायक थे वह नहीं मिल पाया। जहाजी Girmitiyon Ki Kahani

मजदूरों को जहाज से उतरने के बाद अक्सर वीराने नुकुलाऊ द्वीप पर महीने भर रखा जाता था की यदि ये भारत से कोई बीमारी साथ लाए हों तो वह बीमारी फिजी में न फैले यह एक प्रकार का क्वारंताइन ही था।मजदूरों की स्वास्थ्य जांच की जाती जो बिल्कुल ही फिट नहीं निकलते उन्हें वापिस भारत भेज दिया जाता।

इस द्वीप से कइयों ने भागने की कोशिश भी की क्योंकि इस द्वीप से फिजी का ही वीटी द्वीप दिखता था जिन्हें ये मजदूर भारत समझ लेते और वो समुद्र में छलांग लगा देते कुछ दूर तैरने के बाद आखिर डूबकर मर गए इनका हश्र देखकर बाकियों ने भागने की हिम्मत नहीं की बाद में इन टापुओं पर पहुंचते ही पुलिस चारों ओर से घेराबंदी कर लेती ताकि कोई भाग जाए इस नकुलाऊ टापू से ये जहाजी अलग अलग बांट दिए जाते कई तो सगे भाई और पति पत्नी तक होते थे सबको अलग अलग बागानों में काम करने भेज दिया जाता जिंदगी में दोबारा कभी ना मिलने के लिए।

गिरमिटिया आखिर कोन थे गिरमिटिया | Who are girmitiya

इस किताब से आपको भी शायद पहली बार पता चलेगा की कुली एक तमिल शब्द है ।गिरमिटिया शब्द एग्रीमेंट से बना है वह एग्रीमेंट जिसे लिखवाकर अंग्रेज इन भारतीयों को पानी के जहाज पर रवाना करते थे एक अनजान मंजिल की तरफ।

सन 1800 में जब ब्रिटेन में उद्योग क्रांति शुरू हुई थी तो ऐसे समय में ब्रिटेन ने अफ्रीका एशिया ऑस्ट्रेलिया कि अपने उपनिवेशवाद से शुरुआत की इन सभी देशों के लिए काम करने के लिए ज्यादा संख्या में मजदूरों की जरूरत थी परिश्रम शक्ति को पूरा करने के लिए अंग्रेजों ने इस समय के हिंदुस्तान से की देहात से गरीब परिश्रमी भोले भाले मजदूरों को बहला-फुसलाकर एक लिखित एग्रीमेंट के तहत ले जाया जाने लगा जिन्हें गिरमिटिया कहां गया या यूं कहें इस नाम से जाना है ।

उस समय देश में गरीबी भुखमरी बेरोजगारी से जनता त्रस्त थी हर कोई रहने के लिए घर दो समय की रोटी के लिए संघर्षरत था रोटी कपड़ा मकान जैसी मूलभूत जरूरतों के लिए भी आम हिंदुस्तानि को भटकना पड़ रहा था ऐसे समय में अंग्रेजों के चालाक एजेंट सीधे-साधे लोगों को अच्छा काम और अच्छी तनख्वाह का झांसा देकर अनजान उन्हें अनजान द्वीपों और देशों में ले जाने के लिए राजी कर लेते जहां उन्हें अपना कहने वाला कोई नहीं होता था ।

कौन थे अरकाती ( who are arkati )

इन अंग्रजी एजेंटों अरकाटी कहा जाता था एक तरह से उस समय अंग्रेजों के मार्केटिंग सेल्समैन थे जिनके झांसों से बचना गरीबी भुखमरी झेल रहे देहातियों के बहुत मुश्किल था
इन अरकाति एजेंटों की बुराई में कई लोकगीत भी रचे गए।

इन मजदूरों की जिंदगी देश छोड़ते ही नर्क बन जाती थी।अपनों से दूर होने के दुख में यह मजदूर इसने दुखी और प्रताड़ित महसूस करते थे की इन्हें रातों में नींद नहीं आती थी रात दिन रोते रहते थे । कईयों का कोई मानसिक संतुलन भी बिगड़ जाता था अब चूंकि लिखित एग्रीमेंट और खुद की सहमति से आए थे तो अपनी मर्जी से वापस अपने देश भी नहीं लोट सकते ।

गिरमिटियों का भविष्य (future of girmitiya)

समय के साथ साथ इन मजदूरों को उन अजनबी अनजान देशों को अपना घर बनाना पड़ा उनका सब कुछ पीछे बहुत पीछे छूट चुका था लेकिन इनके संस्कार और संस्कृति अभी भी इनके दिलों में थी ।
धीरे धीरे गुलाम से मालिक बने जमीन खरीदकर खेती करना शुरू किया ,व्यापार में हाथ आजमाए, राजनीति, कला, संगीत, समाज सेवा हर क्षेत्र में तरक्की के झंडे गाड़े।

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वर्तमान में मॉरीशस,फिजी, वेस्टइंडीज ,सूरीनाम जैसे देशों में बहुत ही शानदार पहचान बनाए हुए हैं।
बहुत से देशों के राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री के पदों तक भी पहुंचे।

पहला गिरमिटिया जहाज (first girmitiya)

अंग्रेजो द्वारा भारत से गिरमिटिया मजदूरों की पहली खेल फिजी के द्वीपों पर पहुंचाई गई थी। उस समय फिजी में गन्ने की खेती बहुतायत में की जाती थी भारत से ले जाए गए मजदूर खेतों में मजदूरी में लगा दिए गए।आप पढ़ रहें हैं जहाजी Girmitiyon Ki Kahani

विदेशों में भारतीय मजदूर ( Indian labour in foreign)

वर्तमान में फिजी की लगभग 10 लाख की आबादी में 400000 भारतीय मूल के लोग हैं फिजी में आज भी हिंदी फिजियन लहजे के साथ बोली जाती है। कई टीवी चैनल व रेडियो चैनल 24 घंटे हिंदी में सेवाएं दे रहे हैं।

सेशेल्स जैसे द्वीपों पर आज 6% भारतीय रह रहे हैं चकित करने वाला तथ्य यह है की वहां 80% लोगों की रगों में भारतीय खून है।
यहां अफ्रीकन गुलाम भी लाए गए थे लेकिन उनकी संस्कृति मिट चुकी है लेकिन भारतीयता जिंदा है यह जानकर आपको भी भारतीयता का मूल भाव समझने में मदद मिलेगी।

गिरमिटिया की देन (role of girmitiya)

भारतीय मजदूर महिला पुरुष इन देशों,द्वीपों में सिर्फ अपनी पहचान,संस्कारों के साथ ही नहीं गए थे वे अपने साथ आम,इमली,भांग, गांजा,चिलम,तंबाकू के साथ साथ चूहे मारने को नेवला तक साथ लेकर गई थे।

कुंती की चिट्ठी (Kunti ki Chithi)

कुंती भी ऐसी ही जहाजी थी जिसे उसके पति के साथ फिजी के टापुओं पर भेजा गया था लेकिन काम के दौरान अधिकारियों, ओवरसियर आदि द्वारा इसके साथ बलात्कार की कोशिश की गई लेकिन वे सफल नहीं हो सके इनसे बचने के बाद कुंती ने आत्महत्या की कोशिश की लेकिन एक लड़के ने उसे बचा लिया। सन 1913 में कुंती का इन अत्याचारों के विरुद्ध लिखा गया एक पत्र भारतीय अखबारों में छपा जिसने भारत में सनसनी फैला दी जिसमे कुंती ने अपील की थी की फिजी में और मजदूर ना भेजे जाए इसके साथ ही वहां हो रहे अमानवीय क्रूरता का वर्णन किया।

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ऐसे किस्से भी हैं किताब में की किस तरह दो भाई अलग अलग जगह भेज दिए गए जो आगे चलकर एक हिंदू दूसरा मुसलमान में बांट गए बहुत ही विचलित करने वाली घटनाओं का संकलन किया गया है प्रवीन जी द्वारा।

विश्व इतिहास का सबसे बड़ा पलायन (biggest escape of world history)

कुली लाइंस दर्दनाक कहानी सुनाती है विश्व इतिहास के सबसे बड़े पलायन की जिसे कभी भी इतिहास में सम्मानजनक स्थान नहीं मिला। यह कहानी है क्रूर अंग्रेजी साम्राज्य के लालच की और हिंदुस्तान के भोले भाले मासूम लोगों के संघर्ष की यह कहानी है हिंदुस्तान से दूर अनेक हिंदुस्तान बनने की ।

Girmitiyon Ki Kahani koolie lines
Girmitiyon Ki Kahani

इस Girmitiyon Ki Kahani को अंग्रेज छुपाना चाहते थे और भारतीयों ने इसे सुनने में रुचि नहीं दिखाई।

अंग्रेजों से सवाल (questions to Britishers)

इन लोगों का इतिहास उस समय की ब्रिटिश सरकारों से भी कई कड़वे सवाल पूछती है जिन्होंने यह अमानवीयता होने दी जिनके कारण इन लोगों को कभी न्याय नहीं मिल पाया जो दोबारा कभी लौट कर अपने वतन वापस नहीं आ सके और मजबूरी में अपनी नई दुनिया बसाई ।
इन्हें किसी सरकार से कोई मुआवजा नहीं मिला किसी सरकार ने कभी माफी नहीं दी यह कहानी है ऐसे कर्ज की जो अंग्रेजी राज पर सदा के लिए बकाया ही रह गया।

गिरमिटिया का इतिहास (history of girmitiya)

Coolie Lines किताब में मॉरीशस,फिजी ,सूरीनाम के द्वीपों और दक्षिण अफ्रीका में रह रहे गिरमिटिया और कुली के पलायन की जानकारी पलायन व प्रवास की जानकारी के अलावा म्यानमार आदि से हुए पलायन का ऐतिहासिक विवरण देने का प्रयास किया गया है ।
गिरमिटिया लोगों का इतिहास लिखना कठिन कार्य है और लेखक के लिए भी यह विषय कठिन रहा क्योंकि इनका इतिहास टुकड़ों में लिखा गया है व कहीं से भी पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं थी ।

ब्रिटेन फ्रांस में लोगों ने अपने द्वीपों के संबंध में कम लिखा है गिरमिटिया खुद इतने शिक्षित नहीं थे कि अपना इतिहास व्यवस्थित रूप से लिख पाते गिरमिटिया की औलादे भी बाद में खेतों में ही मजदूरी करते रही थी जब तक उनकी तीसरी पीढ़ी पढ़ने लिखने और इतिहास संजोने के लायक हुई तब तक गिरमिटीओं का युग समाप्त हो चुका था ।

गिरमिटिया साहित्य व सबूत (Today Girmitiya evidence)

वर्तमान में गिरमिटिया काल के कोई विशेष अवशेष व सबूत नहीं बचे हैं हिंदुस्तान के इतिहासकारों ने भी इनके विषय पर बहुत कम लिखा है । अंग्रेजी राज के गिरमिटिया ऑफिस में डिपो वर्तमान में नहीं है जिन एग्रीमेंट्स पर दस्तखत करवा कर इन भारतीयों को मजदूरी के नाम पर और आलीशान जिंदगी के ख्वाब दिखाकर पानी के जहाजों में लादकर सुदूर द्वीपों लेकर जाया गाय वह एग्रीमेंट्स की रिपोर्ट भी भारत में उपलब्ध नहीं है ।
यदि लंदन, फ्रांस,नीदरलैंड के गिरमिटिया टापुओं पर कुछ है भी तो वह उनके आर्काइव में धूल भरी फाइलों में बंद पड़ा हैं।

गिरमिटिया के शुभचिंतक ( well-wishers of girmitiya)

यह पुस्तक मजिस्ट्रेट मेजर फगन, डॉक्टर ओलिवर जैसे कुलियों के हमदर्दों को याद करती है साथ ही हिंदुओं को रामायण का पाठ सुनाने वाले मुंशी रहमान खान का परिचय भी करवाती है।
एक साहसी मुस्लिम महिला जान तातेरी भी गई थी मजदूरी करने जहां पर उसने एक हिंदू बच्चे को गोद लेकर उस जमाने में दिलेरी दिखाई थी जो हम सोच भी नहीं सकते।

पुस्तक कुली लाइंस ऐसे लोगों की चर्चा करती है जिन्होंने इन गिरमिटिया मजदूरों को हताश नहीं होने दिया मिटने नहीं दिया उन्हें जगाया उठाया आगे बढ़ाया।

गुमनाम गिरमिटिया (unkwon girmitiya)

यह पुस्तक उत्तर की बजाय प्रश्न अधिक खड़ा करती है जैसे कि क्या भारतीय आज भी दुनिया में सबसे अधिक बंटी हुई जनसंख्या है ? चीनी और यहूदियों से भी अधिक ?
क्यों भारतीय मूल के लोग दुनिया के सुदूर और दुर्गम इलाकों में आज भी रह रहे हैं ?

ऐसे क्या कारण थे क्या विपत्ति आन पड़ी थी ? इन सब के पीछे क्या तर्क दिए जा सकते हैं ? और सबसे बड़ा सवाल की आखिर इन जहाजों के कारण भारत या भारतीयों को क्या मिला ?

सामंतवाद और जातिवाद से जकड़े हुए भारतीय समाज से निकले हुए इन लोगों में से आखिर जातिवाद और भेदभाव कैसे खत्म होता गया ?
लेखक ने सत्य को ज्यों का त्यों प्रस्तुत करने का ईमानदारी से प्रयास किया है ।

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Girmitiyon ki kahani (गिरमिटिया कौन थे )

लेखक श्री प्रवीण कुमार झा कहते हैं कि सत्य अधूरा भी हो तो सच्चा हो उसके साथ छेड़छाड़ न हो यह कथाएं जितनी कही गई जैसे कहीं गई मैंने वैसे ही लिख दी लेखक के रूप में मेरी कलम ने बहुत कम स्वतंत्रता ली है या यूं कहिए इस लेखन में मैं समय एक पराधीन गिरमिटिया बन गया तत्वों के अधीन ही रहा मुक्त न हो सका।

गिरमिटिया से जुड़ी हुई जानकारी किताबों के संदर्भ में लेखक नॉर्वे,ब्रिटेन,नीदरलैंड जैसे देशों के राष्ट्रीय पुस्तकालय,सरकारी पुरालेखों और पुस्तकों का सहयोग लिया जहां से उन्हें कई दुर्लभ कागजात उपलब्ध हुए।
प्रमाणिक जानकारी प्राप्त करने में नीदरलैंड के लोकप्रिय सरनामी गायक श्री राजमोहन जी, भोजपुरी के गायक का सनम तिवारी जी का विशेष सहयोग रहा ।हेग नीदरलैंड में रह रहे सरनामी आंदोलन के अग्रणी मोती महाराज जी व उनके पुत्र पवन मा डीजे में ने भी गिरमिटिया से जुड़े कई दुर्लभ तथ्य व चित्र उपलब्ध करवाएं।

लेखक परिचय

लेखक श्री प्रवीण कुमार झा है जो वर्तमान में नॉर्वे में चिकित्सक हैं लेखक लेखक का जन्म बिहार में हुआ था और वह भारत के अलग-अलग शहरों में कार्य करते हुए अमेरिका होते हुए नार्वे में निवास कर रहे हैं । लेखक के भारतीय अखबारों पत्रिकाओं जैसे हिंदुस्तान, प्रभात खबर, प्रजातंत्र, सदानीरा आदि व मुख्य मीडिया पोर्टल और वेबसाइट पर लेख प्रकाशित होते रहे हैं। कुली लाइंस के अलावा लेखक की चमनलाल की डायरी यात्रा संस्मरण आइसलैंड और नीदरलैंड पर भी लिखे हैं जो पठनीय है।

पुस्तक वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई है जिसे आप प्रकाशन की वेबसाइट से प्राप्त कर सकते हैं इसके अलावा online उपलब्ध हैं तो आज ही मंगवाईए और उन गरीब मजबूर भोले हिंदुस्तानियों के बारे में पढ़िए जिन पर ज्यादा लिखना बोलना जरूरी ही नहीं समझा गया।

कुली लाइंस या गिरमिटिया मजदूरों की ये दर्दभरी कहानी पढ़कर कैसा लगा कमेंट कर जरूर बताएं अच्छा लगे तो शेयर जरूर करें ।
धन्यवाद।

 

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