Dairy of A Young Girl Anne Frank Review।15 साल की लड़की की डायरी

15 साल की लड़की की डायरी, The Diary of A Young Girl Anne Frank

आइए जानते हैं  नीदरलैंड की 15 साल की लड़की की डायरी बारे में जो उसे अपने 13 वें जन्मदिन पर  जून 1942 में पिता से उपहार में मिलती है यह वो समय था जब यहूदियों पर हिटलर के अत्याचार अपने चरम पर थे नाजी सेना ने यूरोप के बड़े हिस्से पर अधिकार कर लिया था पोलैंड,चेकोस्लोवाकिया जैसे देश एक एक कर घुटने टेक रहे थे।

आम और गुमनाम से पूरी आवाम की आवाज तक.

जून 1929 में जन्मी एन फ्रेंक एक आम लड़की थी और आम और गुमनाम ही रहती यदि उसके पिता ऑटो फ्रेंक 1947 में उसकी डायरी प्रकाशित नहीं करवाते।

ऐन ने यूं ही बिना किसी खास मकसद के 1942 की गर्मियों में डायरी लिखनी शुरू की थी जिसे उसने छिपे रहने की अवधि में होने वाली छोटी छोटी बातों को प्रतिदिन के हिसाब से लिखना शुरू किया ।
उसका उद्देश्य एक यहूदी के तौर पर घटनाएं दर्ज करना नहीं था लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के डरावने इंसानी पहलू को प्रामाणिक रूप से इस बच्ची अनजाने में ही सही दुनिया के सामने लाकर रख दिया।

मुसीबतों के पहाड़

नाजी सेना ने जब नीदरलैंड को कब्जा किया तो यह लड़की एन फ्रेंक अपने माता पिता व बहन मार्गोट व एक अन्य 3 सदस्यों वाले परिवार के साथ छिपने के लिए चली जाती है।
छिपने के लिए वे एम्स्टर्डम की उस इमारत का इस्तेमाल करते हैं जहां उसके पिता ऑटो फ्रेंक काम किया करते थे।इमारत के ऊपरी हिस्से में बनी किताबों की एक अलमारी के पीछे की जगह को ये अपने रहने लायक बनाते हैं।

इस इमारत में दो साल छिपे रहने के बाद उनके ठिकाने का पता जर्मनों को चल जाता है जहां से इन सबको एम्स्टर्डम जेल,वेस्टरबोर्क शरणार्थी शिविर व “ओशविट्ज” होते हुए जर्मन बंदी शिविर “बेर्गन बेल्सन” में डाल दिया जाता है।

मार्च 1945 में उस बंदी शिविर में रूसी सेना द्वारा मुक्त करवाए जाने से सिर्फ 2 हफ्ते पहले बहन मार्गोट के साथ साथ एन फ्रेंक की भी “टाइफस” की बीमारी से मौत हो जाती है।
यदि यह डायरी दुनिया के सामने नहीं आती तो लाखों लोगों की तरह सरकारी फाइलों में ऐन फ्रेंक भी एक गुमनाम आंकड़ा भर बन के रह जाती।

ऐन फ्रेंक ने जब डायरी लिखना शुरू किया था तब उसकी उम्र मात्र 13 साल थी और जैसा कि उसकी उम्र देखते हुए हम पाते हैं कि उसने अपनी डायरी भी बहुत ही निश्छलता और ईमानदारी से बिना लागलपेट बच्चों वाली मासुमियत के साथ लिखा है।
उसने सब कुछ लिखा कुछ भी छुपाने का प्रयास नहीं किया जो भी बातें व क्रियाकलाप होते उसे अपने मासूम नजरिए से ज्यों के त्यों पन्नो पर उतार दिया।

उन कठिन हालात में डायरी लिखना ऐन के लिए कितना सुकून भरा था यह 16 मार्च को 1944 को लिखी उसकी लाइनों को पढ़कर महसूस होता है जिसमे वह अपनी डायरी(किटी) को संबोधित कर लिखती है कि
“सबसे अच्छी बात यह है की मैं अपने सभी विचारों व भावनाओं को लिख सकती हूं वरना मेरा तो दम घुट जाता”।15 साल की लड़की की डायरी

डायरी लिखने के लिए उत्साहवर्धन

ऐन ने मार्च 1944 को लंदन से होने वाले डच प्रसारण में मंत्री मि. बॉलक्शटाइन के भाषण को रेडियो पर यह कहते हुए सुना कि युद्ध के बाद उससे जुड़ी डायरियों और पत्रों का एक संग्रह तैयार किया जाएगा।
ऐन खुश होती है कि सब मेरी डायरी पर टूट पड़ेंगे उसे रोमांचक लगता है कि युद्ध के 10 साल बाद लोग जब उसकी डायरी पढ़ेंगे तो उन्हें कितना दिलचस्प लगेगा कि छिपे रहने के दौरान यहूदी कैसे रहते थे क्या खाते थे और किन विषयों पर बात करते थे।

ईसके बाद ऐन ने अपनी डायरी को व्यवस्थित रूप देना व संपादित करना शुरू किया ताकि युद्ध समाप्त होने पर वह उसे प्रकाशित होने के लिए दे सके जो भी देख व अनुभव किया हर उस घटना को दर्ज करने लगी।

डायरी लिखने का उद्देश्य

ऐन ने जब डायरी लिखना शुरू किया तब वह मात्र 13 साल की थी उसने कोई लक्ष्य लेकर या कुछ साबित करने के लिए नहीं लिखा उसने लिखा क्योंकि वह लिखना चाहती थी बस और उसी प्यारी मासुम सच्चाई के साथ लिखा जो इस कच्ची उम्र के बच्चों में होती है।

15 साल की लड़की की डायरी
15 साल की लड़की की डायरी

आज की दुनिया मे डायरी

यहूदियों के सामूहिक संहार को लेकर हुलए वाद-विवादों और विमर्शों के बीच यह डायरी पीड़ित पक्ष की तरफ से आने वाला बहुत सतर्कता पूर्वक तैयार किया गया सारगर्भित दस्तावेज है।

यह 15 साल की लड़की की डायरी दुनिया की अधिकांश भाषाओं में छप चुकी है और बहुत से देशों में बच्चों के स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।
बच्चे अपने स्कूली पाठ्यक्रम में इसे पढ़ते हैं ताकि वह जान सके कि 1940 के भयावह डरावने समय में उनकी ही उम्र की एक लड़की ने क्या कुछ सहा था।

विद्वानों के विचार

शिक्षाशास्त्री व इतिहासकार इस डायरी को द्वितीय विश्व युद्ध की व नाजीवाद पर प्रमाणिक स्रोत के रूप में देखते हैं इस 15 साल की लड़की की डायरी के बारे में डच पत्रकार यान रोमन ने कहा था कि ” एक बच्चे की आवाज सामने आई है”।
ऐन की डायरी हर महाद्वीप में पीढ़ियों को पार करते हुए पहुंची है व यहूदि सामूहिक नरसंहार के पीड़ितों को गुमनाम होने से बचाए रखा है उनके मन के दर्द और पीड़ा को दुनिया के सामने पहुंचाया है। उनके दर्द को एक चेहरा दिया है।

” इतिहास में जितने भी लोगों ने घोर विपदा और पीड़ा के दौर में मानव गरिमा की बात की है उन्होंने एन फ्रैंक की आवाज सबसे आगे हैं”
जॉन एफ कैनेडी

 

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