बंगाल का सन्यासी विद्रोह।आनंदमठ

बंगाल का सन्यासी विद्रोह । आनंदमठ

बंगाल के सन्यासी विद्रोह और अकाल की पृष्ठभूमि पर आधारित बंकिम दा की कालजयी कृति “आनन्दमठ”.

वही आनन्दमठ जिसने हमें कालजयी राष्ट्रगीत “वंदेमातरम”
दिया।

वंदेमातरम..

सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्‌

स्यश्यामलां मातरम्‌ ।

शुभ्रज्योत्‍स्‍नापुलकितयामिनीं

फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीं

सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीं

सुखदां वरदां मातरम्‌ ॥

वंदे मातरम्‌ ।

कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले।

कोटि-कोटि-भुजैधृत-खरकरवाले।

अबला केन मा एत बले ।

बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं

रिपुदलवारिणीं मातरम्‌ ॥

वंदे मातरम्‌ ।

तुमि विद्या, तुमि धर्म

तुमि हृदि, तुमि मर्म

त्वं हि प्राणाः शरीरे

बाहुते तुमि मा शक्ति

हृदये तुमि मा भक्ति

तोमारई प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे मातरम्‌।

वंदे मातरम्‌॥

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी

 

 

कमला कमलदलविहारिणी

वाणी विद्यादायिनी, नामामि त्वाम्‌

कमलां अमलां अतुलां सुजलां सुफलां मातरम्‌।

वंदे मातरम्‌ ॥

श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषितां

धरणीं भरणीं मातरम्‌ ॥

वंदे मातरम्‌ ।

बंकिम बाबू की कलम से निकली वह रचना जो आपको 19 वीं सदी कालखंड के बंगाल को निकट से दिखाती है जो मुगल,अंग्रेज और अकालरूपी दुश्मनों से एक साथ लड़ रहा था।

1857 से पूर्व सुनियोजित तरीके से हुआ विद्रोह जिसे संता

संतान या सन्यासी विद्रोह भी कहते हैं.

सन्यासी जो पूरे देश में फैले हुए थे और मुगल सत्ता के खिलाफ लोगों में भारतभूमि की आजादी के लिए जाग्रत और प्रेरित कर रहे थे…भारतभूमि जिसे वह नारीरूप में माता के रूप में देखते थे जिसके लिए घरबार,बाल-बच्चे, धन संपत्ति का त्याग कर संतान धर्म को धारण कर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए जीवन न्योछावर के लिए हरसमय तैयार थे।

आनन्दमठ” में अकाल,मुगल और अंग्रेजों के बीच पीस रही जनता की दुर्दशा का हृदयविदारक वर्णन किया गया है.

गरीब हो या अमीर दाने दाने को मोहताज होकर पेड़ की छाल खाकर गुजारा कर रहे थे मनुष्य हो या पशु पक्षी भूख से दम तोड़ रहे थे।
एक भी दुकान नहीं लगी थी। जुलाहे अपने करघे बंद करके घर के एक कोने में पड़े रो रहे थे।

व्यवसायी अपना व्यवसाय भूलकर बच्चों को गोद में लिए रो रहे थे। दाताओं ने दान बंद कर दिया था, शिक्षकों ने पाठशालाएं बंद कर दी थीं।
शिशु भी सहमे-सहमे से रो रहे थे। राजपथ पर कोई नजर नहीं आ रहा था। सरोवरों में कोई नहाने वाला भी नहीं था। घरों में लोगों का नामों-निशान नहीं था। पशु-पक्षी भी नज़र नहीं आ रहे थे।
चरने वाली गौएं भी कहीं नज़र नहीं आ रही थीं। केवल शमशान में सियारों व कुत्तों की आवाजे गूंज रहीं थीं।

बंगाल का सन्यासी विद्रोह।आनंदमठ.

यह स्वतंत्रता का पहला संग्राम है।

ह बंगाल के अकाल के समय की कहानी है। महेंद्र और उनकी पत्नी कल्याणी के गाँव छोड़ने से शुरू होती है

कहानी के मुख्य पात्र स्वामी सत्यानंद हैं जो कल्याणी का जीवन बचाते हैं। जीवानंद और भवानंद इनके दो हाथ जैसे शिष्य और कहानी के मुख्य पात्र हैं। मठ के शिष्यों को संतान कहा जाता है। शान्ति का भी त्याग और दृढ़ व्यक्ति के रूम में सशक्त चरित्र चित्रण किया गया है।
कहानी संतानों के स्वाधीनता संग्राम की है। अनुभव न होने के कारण कई बार हारते भी हैं। आनंद मठ के कडे़ अनुशासन के चलते जीवानंद और भवानंद दोनों को ही प्रायश्चित करना होता है।

बंगाल का सन्यासी विद्रोह । आनंदमठ

 

थोड़ी जीत थोड़ी हार के चलते चलते संतान सेना अनुभव इकट्ठा करती है और अंतत: संतानों की अंग्रेज़ी सेना के ऊपर विजय होती है। स्वाधीनता संग्राम की पहली विजय के साथ कहानी यहीं पर समाप्त हो जाती है….

बंगाल का सन्यासी विद्रोह।आनंदमठ.आप भी एक बार इस कालजयी उपन्यास “आनन्दमठ” को अवश्य पढ़िए और हमारे पूर्वजों द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए विपरीत व विकराल परिस्थितियों में भी जीवट भरी शौर्यगाथा को ह्रदय से महसूस कर नमन कीजिए।

यह post आपको कैसी लगी comment कर के बताए व ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पढ़ते हुए स्वस्थ रहें सुरक्षित रहें
Thanks

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